शीतला अष्टमी पूजन के बाद करे शीतला माता की कथा, शीतला माता के रूप का अर्थ। शीतला माता को प्रसन्न करने के लिए चैत्र महीने के कृष्ण पक्ष की सप्तमी/अष्टमी तिथि को उनकी पूजा की जाती हैं। शीतला सप्तमी और शीतला अष्टमी की पूजा करने के बाद शीतला माता की कथा सुनी जाती है। इससे पूजा का सम्पूर्ण फल प्राप्त होता है।
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शीतला अष्टमी पूजन के बाद करे शीतला माता की कथा, जाने शीतला माता के रूप का अर्थ

शीतला माता की कथा: शीतला माता को प्रसन्न करने के लिए चैत्र महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि (शीतला अष्टमी) को उनकी पूजा की जाती हैं। कुछ स्थानों पर सप्तमी तिथि पर भी ये पर्व मनाया जाता है, जिसे शीतला सप्तमी कहते हैं। इस पर्व में एक दिन पूर्व बनाया हुआ भोजन किया जाता है, अत: इसे बसौड़ा, बसियौराबसोरा भी कहते हैं। शीतला सप्तमी और शीतला अष्टमी की पूजा करने के बाद शीतला माता की कथा सुनी जाती है। इससे पूजा का सम्पूर्ण फल प्राप्त होता है। शीतला सप्तमी या अष्टमी की पूजा करने की विधि  व महत्व

शीतला माता के स्वरूप के प्रतीकात्मक अर्थ

शीतला अष्टमी पूजन के बाद करे शीतला माता की कथा, शीतला माता के रूप का अर्थ। शीतला माता को प्रसन्न करने के लिए चैत्र महीने के कृष्ण पक्ष की सप्तमी/अष्टमी तिथि को उनकी पूजा की जाती हैं। शीतला सप्तमी और शीतला अष्टमी की पूजा करने के बाद शीतला माता की कथा सुनी जाती है। इससे पूजा का सम्पूर्ण फल प्राप्त होता है।शीतला माता के स्वरूप के प्रतीकात्मक अर्थ हैं। शीतला माता यानी पर्यावरण के शुद्धिकरण की देवी, जो सृष्टि को विषाणुओं से बचाने का संदेश देती है। माता को साफ-सफाई, स्‍वस्‍थता और शीतलता का प्रतीक माना जाता है।


उनके वस्त्रों का रंग लाल होता है जो खतरे और सतर्कता का प्रतीक माना जाता है। शीतला माता की चारों भुजाओं में झाड़ू, घड़ा, सूप और कटोरा सुशोभित होते हैं जो सफाई का प्रतीक चिन्ह हैं। उनकी सवारी गधा है, जो उन्हें गंदे स्थानों की ओर ले जाती है। झाड़ू उस स्थान की सफाई करने के लिए तो सूप कंकड़-पत्थर को अलग करने के लिए है। घड़े में भरा गंगा जल उस स्थान को विषाणु मुक्त करने के लिए एक प्रतीक के रूप में उनके एक हाथ में होता है।

Sheetala’s name means “the cooling one”. Goddess Sheetala protects mankind from the deadly diseases and plagues smallpox, chickenpox, measles and skin diseases, which can otherwise have negative effects.

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शीतला माता की कथा

शीतला माता के संदर्भ में अनेक कथाएं प्रचलित है एक कथा के अनुसार एक दिन शीतला माता ने सोचा कि कि धरती पर चल कर देखें की  धरती पर उनकी पूजा कौन-कौन करता है, कौन उन्हें मानता है। यही सोचकर शीतला माता एक बुढ़िया का रूप धारण कर धरती पर राजस्थान के डुंगरी गाँव में आई और देखा कि इस गाँव में उनका मंदिर भी नही है, ना ही उनकी पुजा है।

शीतला माता गाँव कि गलियो में घूम रही थी, तभी एक मकान के ऊपर से किसी ने चावल का उबला पानी (मांड) डाल दिया। वह उबलता पानी शीतला माता के ऊपर गिरा जिससे शीतला माता के शरीर में फफोले (छाले) पड गये और पुरे शरीर में जलन होने लगी।

शीतला माता दर्द में कराहते हुए गांव में सभी से सहायता मांगी। लेकिन उस गाँव में किसी ने मदद नही की। वही अपने घर के बहार एक कुम्हारन महिल बेठी थी। उस कुम्हारन ने देखा तो उसको बूढी माई पर बहुत दया आयी।

तब उस कुम्हारन ने माता को बुलाकर घर पर बैठाया और बहुत सारा ठंडा जल माता के ऊपर डाला। ठंडे जल से माता को उन छालों की पीड़ा में काफी राहत महसूस हुई। फिर कुम्हारिन महिला ने माता से कहा की मेरे पास रात के दही और राबड़ी रखी है, आप इनको खाये। रात के रखे दही और ज्वार के आटे कि राबड़ी खा कर माता को शरीर में काफी ठंडक मिली। फिर कुम्हारिन ने माता को कहा, “आपके बाल बिखरे है इनको चोटी में  गूथ देती हूं”।

कुम्हारन माई कि चोटी गूथने हेतु कागसी (कंगी) बालो में करती रही। अचानक कुम्हारन की नज़र बुडी माई के सिर के बालों के नीचे छुपी तीसरी आंख पर गयी और वह यह देख कर घबराकर भागने लगी। तभी उस बूढी माई ने कहा “रुक जा बेटी तु डर मत”,  मैं शीतला देवी हूँ। मैं तो घरती पर देखने आई थी कि मुझे कौन मानता है? कौन मेरी पुजा करता है? इतना कह माता चारभुजा वाली हीरे जवाहरात के आभूषण पहने सिर पर स्वर्णमुकुट धारण किये अपने असली रुप में प्रगट हो गई।

कुम्हारिन महिला शीतला माता को देख कर भाव विभोर हो गई। उसने माता से कहा माता मैं तो बहुत गरीब हूं। आपको कहा बैठाऊ। मेरे घर में ना तो चौकी है, ना बैठने का आसन। तब  माता ने प्रसन्न होकर कुम्हारिन के घर पर खड़े हुए गधे पर जाकर बैठ गई। एक हाथ में झाड़ू दूसरे हाथ में डलिया लेकर उस कुम्हारन के घर कि दरिद्रता को झाड़कर डलिया में भरकर फेक दिया और उस कुम्हारिन की श्रद्धा भाव से खुश हो कर वरदान मांगने को कहा।

कुम्हारिन ने हाथ जोड़कर कहा माता आप वर देना चाहती है तो आप इसी (डुंगरी) गांव में ही निवास करे और जो भी इंसान आपकी श्रद्धा भाव से अष्टमी को पूजा करे और व्रत रखे तथा आपको ठंडा जल, दही व बासी ठंडा भोजन का भोग लगाएं उसकी गरीबी भी ऐसे ही दूर करें। पूजा करने वाली महिला को अखंड शौभाग्य का आशीर्वाद दें। साथ ही जो पुरुष शीतला पूजा के दिन, नाई के यहा बाल ना कटवाये धोबी को पकड़े धुलने ना दे और पुरुष भी आप पर ठंडा जल, नरियल फूल चढ़ाकर परिवार सहित ठंडा बासी भोजन करे उसके काम धंधे व्यापार में कभी दरिद्रता ना आये।

तब माता शीतला ने कहा बेटी ऐसा ही होगा और कहा कि मेरी पूजा का मुख्य अधिकार इस धरती पर कुम्हार को ही होगा। तभी से ये परंपरा चल रही है। इस कथा को पढ़ने से घर कि दरिद्रता का नाश होने के साथ सभी मनोकामना पुरी होती है। Worshipping Goddess Sheetala ensures good health as well as a long and prosperous life for the entire family.

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शीतले त्वं जगन्माता
शीतले त्वं जगत् पिता।
शीतले त्वं जगद्धात्री
शीतलायै नमो नमः।।
|| बोलो श्री शीतला माता की जय ||

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(इस आलेख में दी गई शीतला माता की कथा की जानकारियां धार्मिक आस्थाओं और लौकिक मान्यताओं पर आधारित हैं।)

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