Diwali 2018 अंधकार पर प्रकाश की जीत का पर्व दीपावली, लक्ष्मी पूजन का शुभ मुहूर्त, diwali पूजा विधि
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Diwali 2018: अंधकार पर प्रकाश की जीत का पर्व दीपावली, लक्ष्मी पूजन का शुभ मुहूर्त, पूजा विधि


दीपावली शब्द का अर्थ है: दीपों की माला या दीपों की अवली (श्रृंखला) | इसे दिवाली भी कहा जाता है | इस वर्ष (Diwali 2018), 07 नवंबर को मनाई जाएगी | यह महागणपति , महालक्ष्मी एवं महाकाली की पौराणिक अथवा तांत्रिक विधि से साधना-उपासना का परम पवित्र पर्व है। इस दिन उद्योग-धंधे के साथ-साथ नवीन कार्य करने एवं पुराने व्यापार में खाता पूजन का विशेष विधान है।

दिवाली हर साल शरद ऋतु के मौसम में भारत भर में मनाया जाने वाला सबसे महत्वपूर्ण हिंदू त्यौहार है। इस त्यौहार का आध्यात्मिक महत्व अंधेरे पर प्रकाश की जीत है। यह हर साल अक्टूबर या नवंबर के महीने में पड़ता है। हिन्दू पंचांग के अनुसार यह हर वर्ष कार्तिक मास की अमावस्या के दिन मनाया जाता है l यह पांच दिनों का त्यौहार है जो विशाल तैयारी और उत्साह के साथ मनाया जाता है। लोग पहले दिन धनतेरस मनाते हैं, दूसरे दिन नरक चतुर्दसी और दिवाली तीसरे दिन मनाते हैं । गोवर्धन पूजा चौथे दिन मनाते हैं, और त्योहार के पांचवें दिन भाई दूज मनाया जाता है।


त्योहार के कई दिन पहले, लोग अपने घरों और कार्यालयों की सफाई, नवीनीकरण और सजावट शुरू कर देते हैं। वे नए कपड़े, सजावटी चीजें जैसे दीया, दीपक, मोमबत्तियां, पूजा सामग्री, भगवान और देवी की मूर्ति और विशेष रूप से दिवाली के लिए “लाइट्स” खरीदते हैं।

मान्यता है कि यही अंधकार पर प्रकाश, असत्य पर सत्य, अज्ञान पर ज्ञान और बुराई पर अच्छाई की जीत को दर्शाते हैं। दिवाली को अन्य भाषाओं में अलग-अलग नामों से जाना जाता है जैसे बंगाली में ‘दीपाबॉली‘ नेपाली में ‘तिहार‘ और ‘स्वन्ति‘, सिंधी में ‘दियारी‘, और मारवाड़ी में ‘दियाळी‘। यहां जानिए दिवाली लक्ष्मी पूजन के शुभ मुहूर्त, पूजा की सामग्रियों, पूजा- विधि और दिवाली से जुड़ी मान्यताएं के बारे में.

Diwali 2018 Muhurat शुभ मुहूर्त

अमावस्या तिथि 06 नवम्बर दिन मंगलवार को ही रात में 10 बजकर 06 मिनट से लग जा रही है जो 07 नवम्बर 2018 दिन बुधवार को रात में 09 बजकर 19 मिनट तक रहेगी, इस प्रकार उदया तिथि में अमावस्या का मान सूर्योदय से ही मिल रहा है।

साथ ही प्रदोष काल का भी बहुत ही उत्तम योग मिल रहा है।  इस प्रकार प्रदोष काल में दीपावली पूजन का श्रेष्ठ विधान है तथा प्रदोष काल में ही दीप प्रज्वलित करना उत्तम फल दायक होता है।

07 नवम्बर 2018, बुधवार के 17: 30 से 20:11 तक प्रदोष काल रहेगा| प्रदोष काल समय को दिपावली पूजन के लिये शुभ मुहूर्त के रुप में प्रयोग किया जाता है| प्रदोष काल में भी स्थिर लग्न समय सबसे उतम रहता है|इस दिन 17:59 से 19:53 के दौरान वृष लग्न रहेगा| प्रदोष काल व स्थिर लग्न दोनों रहने से मुहुर्त शुभ रहेगा|

दिन-रात के संयोग काल को ही प्रदोष काल कहते है, जहां दिन विष्णु स्वरुप है वहीँ रात माता लक्ष्मी स्वरुपा हैं ,दोनों के संयोग काल को ही प्रदोष काल कहा जाता है।

इसके अतिरिक्त इस दिन सूर्योदय से स्वाति नक्षत्र पूरा दिन व्याप्त रहेगी। साथ ही सूर्योदय से रात 07:24तक आयुष्मान योग तथा धूम्र योगा व्याप्त रहेगा। बुधवार के दिन दीपावली एवं अमावस्या का पूजन बाजार जगत के लिए उत्तम  एवं शुभदायक होगा।

लक्ष्मी पूजा का मुहूर्त: शाम 17:57 से 19:53 तक।
प्रदोष काल: शाम 17:27 बजे से 20:06 बजे तक।
वृषभ काल: 17:57 बजे से 19:53 बजे से तक।

क्यों मनाई जाती है दिवाली?

दिवाली को लेकर एक से अधिक मान्यताएं मौजूद हैं. यहां जानिए इन मान्यताओं की विस्तृत जानकारी :

दिवाली के साथ कई कहानियाँ जुड़ी है।कुछ मान्यता के अनुसार दिवाली इसलिए मनाई जाती है क्यूँकि इस दिन भगवान राम अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ चौदह वर्ष के वनवास के बाद वापस अयोध्या लौटे थे l अमावस के रात को अन्धकार को मिटाने के लिए और उनका स्वागत करने के लिए अयोध्यावासियों ने घर में घी के दिए जलाए aur दीपों की अवली से पूरे अयोध्या को सजाया था l इसलिए दिवाली को प्रकाशोत्सव भी कहा जाता है।

मां लक्ष्मी का जन्म – एक और पौराणिक कथा के अनुसार धनतेरस के दिन ही क्षीर सागर के मंथन के दौरान माता लक्ष्मी प्रकट हुई थीं. इसीलिए धनतेरस के भी माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है, चूकिं धनतेरस से ही दिवाली पर्व की शुरुआत होती है. इसीलिए दिवाली के दिन को मां लक्ष्मी के जन्म दिवस के तौर पर मनाया जाता है. वहीं, यह भी माना जाता है कि दिवाली की रात को ही मां लक्ष्मी में भगवान विष्णु से शादी की थी.

पांडवों की घर वापसी – महाभारत के अनुसार कौरवों से जुए में हारने के बाद पांडवों 12 साल के लिए हस्तिनापुर से निकाल दिया गया था. इसी के साथ पांडवों को 1 साल का अज्ञातवास भी झेलना पड़ा था. दिवाली के दिन ही 13 साल बाद पांडव वापस हस्तनापुर पहुंचे थे. प्रजा ने उनका स्वागात जगमगाते दीयों से किया. दिवाली के दिन दीप जलाने के पीछे एक वजह यह भी है.

जैन धर्म के लोगो का यह मानना है कि यह वह दिन है जब भगवान महावीर ने ‘मोक्ष’ प्राप्त किया था।आर्य समाज की दयानंद सरसस्वती ने भी इसी दिन निर्वाणा प्राप्त किआ था। सिख धर्म के लोग इसे ‘बंदी छोड़ ‘ दिवस के नाम पर मनाते है l

वहीं, सिख समुदाय के लोग दिवाली के दिन को बन्दी छोड़ दिवस के तौर पर मनाते हैं. मान्यता है कि इस दिन गुरु अमर दास ने अपने गुरु से आशीर्वाद लिया था. वहीं, कहीं मान्यता है कि दिवाली के दिन ही सिख धर्म के छठे धार्मिक नेता गुरु हरगोबिंद कि मुगल बादशाह जहांगीर से रिहाई हुई थी.

क्या करते हैं दीपावली पर?

लोग दिवाली की तैयारी दशहरा के बाद से ही शुरू कर देते पुताई | घर दुकानों आदि की खूब सफाई – पुताई की जाती है | दिवाली के अवसर पर लोग अपने घरों की सजावट करते हैं और खूब सारे ‘लाइट्स ‘ लगाते हैं | दिवाली के सुबह से ही लोग तैयारी में जुट जाते हैं और विविन प्रकार के व्यंजन और मिठाई पकाते हैं l दिवाली के उपलक्ष पर लोग घर के बाहर रंगोली भी बनाते हैं l शाम होते ही वे अपने घरों पर दीये जलाते हैं | घर का हर कोना साफ़ और दीये से प्रज्वलित रहता है |लोग अपने जीवन में धन और समृद्धि प्राप्त करने के लिए भगवान गणेश और देवी लक्ष्मी की पूजा करते हैं। वे  दीवाली के शाम  बहुत सारे अनुष्ठानों के साथ पूजा करते हैं। पूजा के बाद,आतिशबाजी किया जाता हैं और फिर पड़ोसियों, परिवार के सदस्यों, दोस्तों, कार्यालयों आदि के बीच एक-दूसरे को उपहार देते हैं।

दिवाली पूजा के लिए जरूरी सामग्रियां

लक्ष्मी-गणेश की प्रतिमा, लक्ष्मी जी को अर्पित किए जाने वाले वस्त्र, लाल कपड़ा, सप्तधान्य, गुलाल, लौंग, अगरबत्ती, हल्दी, अर्घ्य पात्र, फूलों की माला और खुले फूल, सुपारी, सिंदूर, इत्र, इलायची, कपूर, केसर, सीताफल, कमलगट्टे, कुशा, कुंकु, साबुत धनिया (जिसे धनतेरस पर खरीदा हो), खील-बताशे, गंगाजल, देसी घी, चंदन, चांदी का सिक्का, अक्षत, दही, दीपक, दूध, लौंग लगा पान, दूब घास, गेहूं, धूप बत्ती, मिठाई, पंचमेवा, पंच पल्लव (गूलर, गांव, आम, पाकर और बड़ के पत्ते), तेल, मौली, रूई, पांच यज्ञोपवीत (धागा), रोली, लाल कपड़ा, चीनी, शहद, नारियल और हल्दी की गांठ.

पूजा विधि

 

दिवाली की पूजा में सबसे पहले एक चौकी पर लाल वस्त्र बिछा कर उस पर मां लक्ष्मी, सरस्वती व गणेश जी का चित्र या प्रतिमा को विराजमान करें। इसके बाद हाथ में पूजा के जलपात्र से थोड़ा-सा जल लेकर उसे प्रतिमा के ऊपर  निम्न मंत्र पढ़ते हुए छिड़कें। बाद में इसी तरह से स्वयं को तथा अपने पूजा के आसन को भी इसी तरह जल छिड़ककर पवित्र कर लें।

ऊँ अपवित्र: पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोपि वा। य: स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स: वाह्याभंतर: शुचि:।।

इसके बाद मां पृथ्वी को प्रणाम करके निम्न मंत्र बोलें तथा उनसे क्षमा प्रार्थना करते हुए अपने आसन पर विराजमान हों

दिवाली पूजन में सबसे पहले श्री गणेश जी का ध्यान करें। इसके बाद गणपति को स्नान कराएं और नए वस्त्र और फूल अर्पित करें।

इसके बाद “ॐ केशवाय नमः, ॐ नारायणाय नमः, ॐ माधवाय नमः” कहते हुए गंगाजल का आचमन करें ।

इसके बाद देवी लक्ष्मी का पूजन शुरू करें। मां लक्ष्मी की प्रतिमा को पूजा स्थान पर रखें। मूर्ति में मां लक्ष्मी का आवाहन करें। हाथ जोड़कर उनसे प्रार्थना करें कि वे आपके घर आएं।

अब लक्ष्मी जी को स्नान कराएं। स्नान पहले जल फिर पंचामृत और फिर वापिस जल से स्नान कराएं। उन्हें वस्त्र अर्पित करें। वस्त्रों के बाद आभूषण और माला पहनाएं।

इत्र अर्पित कर कुमकुम का तिलक लगाएं। अब धूप व दीप जलाएं और माता के पैरों में गुलाब के फूल अर्पित करें। इसके बाद बेल पत्थर और उसके पत्ते भी उनके पैरों के पास रखें। 11 या 21 चावल अर्पित कर आरती करें। आरती के बाद परिक्रमा करें। अब उन्हें भोग लगाएं।

ध्‍यान: अब इस मंत्र का उच्‍चारण करते हुए मां लक्ष्‍मी का ध्‍यान करें.
या सा पद्मासनस्था विपुल-कटि-तटी पद्म-पत्रायताक्षी,
गम्भीरार्तव-नाभि: स्तन-भर-नमिता शुभ्र-वस्त्रोत्तरीया ।
या लक्ष्मीर्दिव्य-रूपैर्मणि-गण-खचितैः स्‍वापिता हेम-कुम्भैः,
सा नित्यं पद्म-हस्ता मम वसतु गृहे सर्व-मांगल्य-युक्ता ।।

आवाह्न: अब इस मंत्र का उच्‍चारण करते हुए मां लक्ष्‍मी का आवाह्न करें.
आगच्‍छ देव-देवेशि! तेजोमय‍ि महा-लक्ष्‍मी !
क्रियमाणां मया पूजां, गृहाण सुर-वन्दिते !
।। श्रीलक्ष्‍मी देवीं आवाह्यामि ।।

पुष्‍पांजलि आसन: अब इस मंत्र का उच्‍चारण करते हुए हाथ में पांच पुष्‍प अंजलि में लेकर अर्पित करें.
स्‍वागत: अब श्रीलक्ष्‍मी देवी ! स्‍वागतम् मंत्र का उच्‍चारण करते हुए मां लक्ष्‍मी का स्‍वागत करें.

पाद्य: अब इस मंत्र का उच्‍चारण करते हुए मां लक्ष्‍मी के चरण धोने के लिए जल अर्पित करें.
पाद्यं गृहाण देवेशि, सर्व-क्षेम-समर्थे, भो: !
भक्तया समर्पितं देवि, महालक्ष्‍मी !  नमोsस्‍तुते ।।
।। श्रीलक्ष्‍मी-देव्‍यै पाद्यं नम: 

स्‍नान: अब इस मंत्र का उच्‍चारण करते हुए मां लक्ष्‍मी की प्रतिमा को जल से स्‍नान कराएं. फिर  दूध, दही, घी, शहद और चीनी के मिश्रण यानी कि पंचामृत से स्‍नान कराएं. आखिर में शुद्ध जल से स्‍नान कराएं.
वस्‍त्र: अब मां लक्ष्‍मी को मोली के रूप में वस्‍त्र अर्पित करें.
आभूषण: अब मां लक्ष्‍मी को आभूषण चढ़ाएं.
सिंदूर: अब मां लक्ष्‍मी को सिंदूर चढ़ाएं.
कुमकुम: अब कुमकुम समर्पित करें.
ॐ कुमकुम कामदं दिव्‍यं कुमकुम कामरूपिणम् ।
अखंडकामसौभाग्‍यं कुमकुम प्रतिगृह्यताम् ।।
।। श्रीलक्ष्‍मी देव्‍यै कुमकुम सर्पयामि ।।

अक्षत: अब अक्षत चढ़ाएं.
अक्षताश्च सुरश्रेष्‍ठं कुंकमाक्‍ता: सुशोभिता: ।
मया निवेदिता भक्‍तया पूजार्थं प्रतिगृह्यताम् ।।
।। श्रीलक्ष्‍मी देव्‍यै अक्षतान् सर्पयामि ।।

गंध: अब मां लक्ष्‍मी को चंदन समर्पित करें.
श्री खंड चंदन दिव्‍यं, गंधाढ्यं सुमनोहरम् ।
विलेपनं महालक्ष्‍मी चंदनं प्रति गृह्यताम् ।
।। श्रीलक्ष्‍मी देव्‍यै चंदनं सर्पयामि ।।

पुष्‍प: अब पुष्‍प समर्पिम करें.
यथाप्राप्‍तऋतुपुष्‍पै:, विल्‍वतुलसीदलैश्च ।
पूजयामि महालक्ष्‍मी प्रसीद मे सुरेश्वरि ।
।। श्रीलक्ष्‍मी देव्‍यै पुष्‍पं सर्पयामि ।।

अंग पूजन: अब हर एक मंत्र का उच्‍चारण करते हुए बाएं हाथ में फूल, चावल और चंदन लेकर दाहिने हाथ से मां लक्ष्‍मी की प्रतिमा के आगे रखें.

– अब मां लक्ष्‍मी को धूप, दीपक और नैवेद्य (मिष्‍ठान) समपर्ति करें. फिर उन्‍हें पानी देकर आचमन कराएं.
-इसके बाद ताम्‍बूल अर्पित करें और दक्षिणा दें.
– फिर अब मां लक्ष्‍मी की बाएं से दाएं प्रदक्षिणा करें.
– अब मां लक्ष्‍मी को साष्‍टांग प्रणाम कर उनसे पूजा के दौरान हुई ज्ञात-अज्ञात भूल के लिए माफी मांगे.
– इसके बाद मां लक्ष्‍मी की आरती उतारें

अंत में माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की आरती गाएं |

“ दीपों का त्योहार दीवाली।

खुशियों का त्योहार दीवाली॥

वनवास पूरा कर आये श्रीराम।

अयोध्या के मन भाये श्रीराम।।

घर-घर सजे , सजे हैं आँगन।

जलते पटाखे, फ़ुलझड़ियाँ बम।।

लक्ष्मी गणेश का पूजन करें लोग।

लड्डुओं का लगता है भोग॥

पहनें नये कपड़े, खिलाते है मिठाई ।

देखो देखो दीपावली आई॥”

|| दिवाली की हार्दिक शुभकामनाएँ ||

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(इस आलेख में दी गई Diwali 2018 की जानकारियां धार्मिक आस्थाओं और लौकिक मान्यताओं पर आधारित हैं, जिसे मात्र सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है।)

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