Sawan Pradosh Vrat 2020: हिन्दू धर्म के अनुसार प्रदोष व्रत, कलियुग में अति मंगलकारी और शिव कृपा प्रदान करने वाला व्रत है। माह की त्रयोदशी तिथि में सायं काल (दिन और रात के मिलन) को प्रदोष काल कहा जाता है। श्रावण मास का पहला प्रदोष व्रत 18 जुलाई दिन शनिवार को पड़ रहा है। प्रदोष व्रत करने से घर में सभी प्रकार के सुख और समृद्धि आती है।
हिन्दू कैलेंडर (पंचांग) के अनुसार, प्रदोष व्रत हर माह की त्रयोदशी तिथि के दिन किया जाता है। हर माह में प्रदोष व्रत दो बार आता है- एक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को और दूसरा शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को। माना जाता है कि इस दिन संध्या के समय विधिवत तरीके से भगवान शिव और मां पार्वती की पूजा अर्चना करने से विशेष आशीर्वाद की प्राप्ति होती है।
सावन महीने की कृष्ण पक्ष त्रयोदशी तिथि, 18 जुलाई को सावन का पहला प्रदोष व्रत है। सावन माह में पड़ने वाले प्रदोष व्रत का अपना अलग ही महत्व होता है। शनिवार के दिन प्रदोष व्रत होने के कारण इसे शनि प्रदोष व्रत कहा जाता है। शनि प्रदोष व्रत के दिन विधि विधान से भगवान शिव और शनि देव की पूजा करने से सभी कष्टों का नाश होता है, आरोग्य रहने का आशीर्वाद मिलता हैं, सभी मनोकामनाओं की पूर्ति होती है, और मोक्ष प्राप्त होता है।
देवों के देव महादेव का सबसे प्रिय व पवित्र सावन माह में दोनों प्रदोष व्रत शनिवार को पड़ रहे है। जिसके कारण इसका महत्व और अधिक बढ़ जाता है। अगर आपकी कुंडली में शनि दोष, साढ़े साती, शनि की लघु कल्याणी ढैय्या आदि है तो 18 जुलाई और 1 अगस्त को जरूर पूजन करें। शनिदेव की उपासना व्यक्ति की सारी इच्छाओं को पूरा करने वाली और जीवन से हर तरह की Negativity को दूर करने वाला हैं। जानें शनि प्रदोष व्रत पूजा विधि, पूजा का शुभ मुहूर्त, व्रत का लाभ और व्रत से जुड़ी मान्यताए-
Sawan Pradosh Vrat 2020 Shubh Muhurat
प्रदोष व्रत में शाम की पूजा का विशेष महत्व होता है।
सावन मास की त्रयोदशी तिथि का प्रारंभ – 17 जुलाई को देर रात 12 बजकर 33 मिनट से
त्रयोेदशी तिथि समाप्त – अगले दिन 18 जुलाई की देर रात 12 बजकर 41 मिनट तक
शनि प्रदोष की पूजा 18 July को शाम 07 बजकर 20 मिनट से रात 09 बजकर 23 मिनट तक की जा सकती है। प्रदोष पूजा के लिए कुल 2 घंटे 03 मिनट का समय मिल रहा है।
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प्रदोष व्रत पूजा विधि
- त्रयोदशी तिथि के दिन प्रात: सूर्य उदय से पूर्व उठकर दैनिक कार्यों से निवृत्त होकर स्नान करें।
- स्नान करने के बाद स्वच्छ सफेद रंग के वस्त्र धारण कर, भगवान शिव को स्मरण करके व्रत का संकल्प करें।
- प्रदोष पूजा शाम के समय होती है। इस व्रत में काले वस्त्र न पहनें।
- दिन भर शुद्ध आचरण के साथ निराहार रहकर व्रत रखें और भगवान शिव और मां पार्वती का ध्यान करते रहें।
- सूर्यास्त से एक घंटा पहले, स्नान आदि कर स्वच्छ श्वेत वस्त्र धारण कर, दिए गए मुहूर्त में देवों के देव महादेव, माता पार्वती की विधिपूर्वक पूजा अर्चना करें।
- पूजन स्थल को गंगाजल या स्वच्छ जल से शुद्ध करे।
- पूजा स्थल पर पूर्व या उत्तर दिशा में मुख करके पूजन सामग्री (धूप, दीप, घी, सफेद पुष्प, सफेद फूलों की माला, आंकड़े का फूल, सफेद मिठाइयां, सफेद चंदन, सफेद वस्त्र, जल से भरा हुआ कलश, कर्पुर, आरती के लिए थाली, बेल-पत्र, धतुरा, भांग, आम की लकड़ी) लेकर कुशा के आसन पर बैठ जाएं।
- इसके बाद भगवान शिव शंकर को गंगाजल से अभिषेक करें। भगवान को सफेद पुष्प, अक्षत्, भांग, धतूरा, सफेद चंदन, गाय का दूध, ऋतु फल, आंकड़े का फूल और मिठाइयां आदि नैवेद्य अर्पित करें।
- “ऊँ नम: शिवाय” मंत्र का जाप करें। शिव चालीसा का पाठ करें और पूजन के पश्चात् धूप, घी के दीये से भगवान शिव की आरती करें।
- प्रदोष की कथा सुनें और सुनायें। पूजा संपन्न होने के बाद पूजा का प्रसाद सभी को वितरित करें। प्रदोष व्रत का उद्यापन त्रयोदश तिथि को ही करना चाहिए।
- इस दिन रात्रि को भी भगवान का ध्यान और पूजन करते रहना चाहिए।
प्रदोष व्रत से जुड़ी मान्यता
शनि प्रदोष व्रत संतान प्राप्ति एवं संतान की उन्नति व कल्याण के लिए किया जाता है। प्रदोष-व्रत चन्द्रमौलेश्वर भगवान शिव की प्रसन्नता व आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि प्रदोष के समय भगवान शिव शंकर कैलाश पर्वत के रजत भवन में होते हैं और नृत्य कर रहे होते हैं और इस दौरान देवता भगवान के गुणों का स्तवन करते हैं।
प्रदोष को प्रदोष कहने के पीछे एक कथा जुड़ी हुई है। संक्षेप में यह कि चन्द्र देव को क्षय रोग था, जिसके चलते उन्हें मृत्युतुल्य कष्ट हो रहा था। भगवान शिव ने त्रयोदशी के दिन उस दोष का निवारण कर उन्हें पुन: जीवन प्रदान किया अत: इस दिन को प्रदोष कहा जाने लगा।
प्रदोष व्रत का महत्व
शास्त्रों के अनुसार प्रदोष व्रत रखने वाला व्यक्ति जन्म- जन्मान्तर के फेरों से निकल कर मोक्ष मार्ग पर आगे बढ़ता है, उसे उतम लोक की प्राप्ति होती है। जो व्यक्ति त्रयोदशी का व्रत रख, शिव आराधना करेगा, उस पर शिव कृ्पा होगी. स्कंदपुराण के अनुसार जो भक्त प्रदोषव्रत के दिन शिवपूजा के बाद एक्राग होकर प्रदोष व्रत कथा सुनता या पढ़ता है उसे सौ जन्मों तक कभी दरिद्रता नहीं होती।
प्रदोष व्रत का महत्व वार के मुताबिक अलग-अलग होता है। यह भी मान्यता है कि यदि यह व्रत सोमवार के दिन पड़ता है और जो भी इस (सोम प्रदोष व्रत) को करता है उसकी हर इच्छा फलित होती है। यदि यह व्रत मंगलवार को है तो, भौम प्रदोष व्रत करने वाले को रोगों से मुक्ति मिलती है। यदि यह व्रत बुधवार को है तो बुध प्रदोष व्रत करने वाले की सभी कामनाएँ पूर्ण होती हैं। यदि यह व्रत गुरुवार को है तो गुरुवारा प्रदोष व्रत करने वाले के शत्रु का नाश होता है और सौभाग्य में वृद्धि होती है। शुक्रवार को पड़ने वाले प्रदोष व्रत को भ्रुगुवारा प्रदोष कहा जाता है, जीवन में सौभाग्य की वृद्धि हेतु यह प्रदोष किया जाता है। यदि यह व्रत शनिवार को पड़ रहा है तो पुत्र की प्राप्ति होती है और यदि यह व्रत रविवार को पड़ रहा है तो रवि प्रदोष व्रत करने वाला सदा निरोगी रहता है।
माना जाता है कि त्रयोदशी व्रत करने वाले को सौ गाय दान करने के बराबर फल प्राप्त होता है। इस व्रत को जो विधि विधान और तन, मन, धन से करता है उसके सभी कष्ट दूर हो जाते हैं।
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शनि प्रदोष व्रत के लाभ
शनि प्रदोष व्रत करने से भगवान शिव खुश होते हैं। इस व्रत के करने से भगवान शिव, भगवान शनिदेव की कृपा प्राप्त होती है। एक वर्ष तक लगातार यह व्रत करने से महादेव मनोकामनाओं की पूर्ति करके व्रती के सभी पाप, कष्टों, दोषों और संकटों को हर लेते हैं एवं मनुष्य को अभीष्ट की प्राप्ति होती है। भक्तजन नौकरी में पदोन्नति की प्राप्ति के लिए भी शनि प्रदोष व्रत करते हैं।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार भगवान शनिदेव को मनाने के ऐसे कई उपाय हैं जिनके द्वारा शनि की शांति होती है इसमें शनि प्रदोष के दिन का अधिक महत्व है। माना जाता है कि शनि प्रदोष व्रत के दिन कोई जातक पूरी श्रद्धा व मन से शनि देव की उपासना करें तो शनि का प्रकोप, शनि की साढ़ेसाती या ढैया का प्रभाव भी कम हो जाता है। यह व्रत करने वाले पर शनिदेव की असीम कृपा होती है।
शनि दोषों से मुक्ति के उपाय
- शनि प्रदोष व्रत के दिन शनि भगवान की पूजा होती है। काला तिल, काला वस्त्र, तेल, उड़द शनि को बहुत प्रिय हैं। इसलिए इनके द्वारा शनि की पूजा होती है।
- शनिदेव को प्रसन्न करने के लिए शनिवार के दिन पीपल के पेड़ के नीचे काली बाती बनाकर सरसों तेल का दीप जलाएं।
- पीपल को जल और काली चिंटियों गुड़ खिलाएं तो शनि के दोषों से मुक्ति मिलती है।
- हनुमान चलीसा का नियमित पाठ करने पर शनि के दोषों से मुक्ति मिलती है।
- किसी धार्मिक कार्यक्रम में ईधन जैसे लकड़ी, कोयला आदि दान करने से शनि का बुरा प्रभाव टल जाता हैं।
- श्रावण शनिवार के दिन तांबे के लोटे में जल लेकर उसमें काले तिल डालकर शिवलिंग पर अर्पित करें। ऐसा करने से व्यक्ति को शनि से मिलने वाले कष्टों में कमी आएगी।
- यदि संभव हो तो इस दिन कांसे की कटोरी में तिल का तेल लेकर अपना चेहरा देखना चाहिये और जो भी शनिदेव के नाम का दान स्वीकार करता हो उसे तेल दान कर दें।
- इस दिन बूंदी के लड्डू यदि काली गाय को खिलाएंगे तो भाग्योदय होगा। इसके साथ ही काले कुत्ते को तेल से चुपड़ी हुई रोटी खिलानी चाहिए।
- शनि प्रदोष के दिन कम से कम एक माला शनि मंत्र का जाप करना चाहिए। जाप के दौरान उच्चारण शुद्ध रहना चाहिए।
- गरीब को तेल में बने खाद्य पदार्थ खिलाएं।
- जरूरतमंदों की मदद करें।
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Sawan Pradosh Vrat 2020 की हार्दिक शुभकामनाएं !!
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(इस आलेख में दी गई Sawan Pradosh Vrat 2020 की जानकारियां धार्मिक आस्थाओं और लौकिक मान्यताओं पर आधारित हैं, जिसे मात्र सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है।)




