पहले यम के प्रतीक कौआ, कुत्ते और गाय का अंश निकालें (इसमें भोजन की समस्त सामग्री में से कुछ अंश डालें) । फिर किसी पात्र में दूध, जल, काले तिल और पुष्प लें। कुश और काले तिलों के साथ तीन बार तर्पण करें। ऊं पितृदेवताभ्यो नम: पढ़ते रहें। बाएं हाथ में जल का पात्र लें और दाएं हाथ के अंगूठे को पृथ्वी की तरफ करते हुए उस पर जल डालते हुए तर्पण करते रहें। वस्त्रादि जो भी आप चाहें पितरों के निमित निकाल कर दान कर सकते हैं।
पितरों की शांति के लिए एक माला प्रतिदिन ऊं पितृ देवताभ्यो नम: की करें और ऊं नमो भगवते वासुदेवाय नम: का जाप करते रहें
भगवद्गीता या भागवत का पाठ भी कर सकते हैं ।
READ Too: Hindu Festivals In Bhadrapada / Bhado 2018, One Of The Auspicious Month For Devotion
यदि ये सब न कर सकें तो –
दूरदराज में रहने वाले, सामग्री उपलब्ध नहीं होने, तर्पण की व्यवस्था नहीं हो पाने पर एक सरल उपाय के माध्यम से पितरों को तृप्त किया जा सकता है। दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके खड़े हो जाइए। अपने दाएं हाथ के अंगूठे को पृथ्वी की ओर करिए। 11 बार पढ़ें –
ऊं पितृदेवताभ्यो नम:। ऊं मातृ देवताभ्यो नम: ।
यह भी ध्यान रखें –
- पुरुष का श्राद्ध पुरुष को, महिला का श्राद्ध महिला को दिया जाना चाहिए ।
- यदि पंडित उपलब्ध नहीं हैं तो श्राद्ध भोजन मंदिर में या गरीब लोगों को दे सकते हैं ।
- यदि कोई विषम परिस्थिति न हो तो श्राद्ध को नहीं छोड़ना चाहिए। हमारे पितृ अपनी मृत्यु तिथि को श्राद्ध की अपेक्षा करते हैं। इसलिए यथा संभव उस तिथि को श्राद्ध कर देना चाहिए।
- यदि तिथि याद न हो और किन्हीं कारणों से नहीं कर सकें तो पितृ अमावस्य़ा को अवश्य श्राद्ध कर देना चाहिए।
Shraddh Paksh 2018 Dates | श्राद्ध की तिथियां
24 सितंबर- पूर्णिमा श्राद्ध – सोमवार
25 सितंबर – प्रतिपदा श्राद्ध – मंगलवार
26 सितंबर – द्वितीय श्राद्ध – बुधवार
27 सितंबर – तृतीय श्राद्ध – गुरुवार (वीरवार)
28 सितंबर – चतुर्थी श्राद्ध – शुक्रवार
29 सितंबर – पंचमी श्राद्ध – शनिवार
30 सितंबर – षष्ठी श्राद्ध – रविवार
1 अक्टूबर – सप्तमी श्राद्ध – सोमवार
2 अक्टूबर – अष्टमी श्राद्ध – मंगलवार
3 अक्टूबर – नवमी श्राद्ध – बुधवार
4 अक्टूबर – दशमी श्राद्ध – वीरवार (गुरुवार)
5 अक्टूबर – एकादशी श्राद्ध – शुक्रवार
6 अक्टूबर – द्वादशी श्राद्ध – शनिवार
7 अक्टूबर -त्रयोदशी श्राद्ध, चतुर्दशी श्राद्ध – रविवार
8 अक्टूबर – सर्वपितृ अमावस्या श्राद्ध – सोमवार
READ ALSO: भगवान शिव और उनका अनोखा घर-संसार, शिवालय का तत्त्व-रहस्य
किस श्राद्ध का क्या महत्व?
पूर्णिमा का श्राद्ध
किसी व्यक्ति की मृत्यु पूर्णिमा को हो तो उसका श्राद्ध भाद्र शुक्ल पूर्णिमा को करना चाहिए। इसमें दादा-दादी, परदादी और नाना-नानी का श्राद्ध करना चाहिए।
भरणी का श्राद्ध
28 सितंबर को चतुर्थी तिथि दिन शुक्रवार को भरणी नक्षत्र होने के कारण भरणी का श्राद्ध कहा जाता है। भरणी नक्षत्र में पितरों का पार्वण श्राद्ध करने का विशेष महत्व है। यह श्राद्ध करने से गया श्राद्ध करने का महत्व है।
नवमी का श्राद्ध
नवमी तिथि को सौभाग्यवती स्त्रियों का श्राद्ध किया जाता है।
संन्यासियों का श्राद्ध
संन्यासियों का श्राद्ध पार्वण पद्धति से द्वादशी में किया जाता है। भले ही इनकी मृत्यु तिथि कोई भी क्यों न हो।
मघा का श्राद्ध
06 अक्तूबर दिन शनिवार को मघा नक्षत्र होने के कारण मघा का श्राद्ध कहते हैं। उनके अनुसार जिनके जन्म कुंडली में पितृदोष के कारण घर परिवार में और पति पत्नी में क्लेश अशांति हो तो वह शांत हो जाता है। घर में सुख शांति रहती है।
अकाल मृत्यु वालों का श्राद्ध
वाहन दुर्घटना, सांप के काटने से, जहर के खाने से, अकाल मृत्यु के कारण जिसकी मृत्यु हुई हो उसका श्राद्ध चतुर्दशी तिथि में करना चाहिए।
चतुर्दशी तिथि में मरने वालों का श्राद्ध चतुर्दशी में नहीं करना चाहिए। इसका श्राद्ध त्रयोदशी या अमावस्या को करना चाहिए, जिसे किसी की मृत्यु की तिथि का ज्ञान न हो उसका श्राद्ध अमावस्या को करना चाहिए।
READ MORE: Goga Navami – राजस्थान का लोक पर्व, होती है सांपों के देवता ‘गोगा जी’ की पूजा
Different Types of Shraddh | विभिन तरह के श्राद्ध
नित्य श्राद्ध – पितृपक्ष के पूरे दिनों में हर रोज जल, अन्न, दूध और कुश से श्राद्ध करने से पितर प्रसन्न होते हैं।
नैमित्तिक श्राद्ध – माता-पिता की मृत्यु के दिन यह श्राद्ध किया जाता है। इसे एकोदिष्ट कहा जाता है।
काम्य श्राद्ध – यह श्राद्ध विशेष सिद्धि की प्राप्ति के लिए किया जाता है।
वृद्धि श्राद्ध – सौभाग्य और सुख में कामना कामने के लिए वृद्धि श्राद्ध किया जाता है।
सपिंडन श्राद्ध – यह श्राद्ध मृत व्यक्तियों को 12वें दिन किया जाता है। इसे महिलाएं भी कर सकती है।
पार्वण श्राद्ध – इस श्राद्ध को पर्व की तिथि पर किया जाता है। इसलिए इसे पार्वण श्राद्ध कहा जाता है।
गोष्ठी श्राद्ध – जो श्राद्ध परिवार के सभी सदस्य मिलकर करते हैं उसे गोष्ठी श्राद्ध कहा जाता है।
शुद्धयर्थ श्राद्ध – पितृपक्ष में किया जाने वाले यह श्राद्ध परिवार की शुद्धता के लिए किया जाता है।
कर्मांग श्राद्ध – किसी संस्कार के मौके पर किया जाने वाले श्राद्ध कर्मांग श्राद्ध कहलाता है।
तीर्थ श्राद्ध – किसी तीर्थ पर किये जाने वाला श्राद्ध तीर्थ श्राद्ध कहा जाता है।
यात्रार्थ श्राद्ध – जो श्राद्ध यात्रा की सफलता के लिए किया जाता है उसे याश्रार्थ श्राद्ध कहा जाता है।
पुष्टयर्थ श्राद्ध – जो श्राद्ध आर्थिक उन्ननि के लिए किए जाते हो इसे पुष्टयर्थ श्राद्ध कहा जाता है।
ALSO READ: Why Jodhpur Worship Sheetala Mata On Ashtami Not On Saptami?
Connect with us for all latest updates also through Facebook. Let us know for any queries or comments. Do comment below