Shravan (Sawan), the fifth month of Hindu calendar is one of the auspicious months to worship Lord Shiva. Mondays (Somvar) in Shravan are considered auspicious and are dedicated to Lord Shiva. This year 2018, 3rd Shravan Somvar fall on August 13, इस दिन बेहद शुभ संयोग बनने जा रहा है as Hariyali Teej is also on the same day.
सावन महीने की शुक्ल पक्ष की तृतीया को प्रेम और सौंदर्य का प्रतीक पर्व हरियाली तीज मनाया जाता है। इस उत्सव को श्रावणी तीज भी कहते हैं। हरियाली तीज पर सुहागन महिलाएं व्रत रखकर और सोलह श्रृंगार कर अपने पति की लंबी आयु के लिए माता पार्वती और भगवान शिवकी पूजा-अर्चना करती हैं। इस पर्व पर महिलाएं में मेंहदी, सुहाग का प्रतीक सिंघारे और झूला झूलने का विशेष महत्व होता है।
कथा के अनुसार देवी पार्वती ने भगवान शंकर को पति रूप में पाने के लिए वर्षों तक तपस्या की थी। इसके लिए माता पार्वती को 108 बार जन्म लेना पड़ा था। तब जाकर भगवान शिव ने उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया था। तभी से इस व्रत को मनाने की परंपरा है।
सावन का तीसरे सोमवार के दिन महान शिव योग के साथ पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र है, इस दिन मधुस्रावणी पर्व भी है जिसे सौभाग्य कारक माना गया है। माना जाता है कि शिवयोग में शिव की पूजा से भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न होते हैं। Observing fast on Shravan Somvar and performing puja and Rudrabhishek brings peace, prosperity, good health and marital bliss.
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भगवान शिव के विभिन्न नाम
‘शिव‘ शब्द का अर्थ है ‘कल्याण‘। शिव ही शंकर है। ‘शं’ का भी अर्थ है ‘कल्याण’; कर का अर्थ है-करने वाला, अर्थात् कल्याण करने वाला। पुराणों में भगवान शिव के अनेक नाम प्राप्त होते हैं। भगवान शिव के नामों का इतिहास उनकी अनेक क्रीड़ाओं, रूप, गुण, धाम, वाहन, आयुध आदि पर आधारित हैं।
इनमें पांच नाम विशेष रूप से प्रमुख हैं-ईशान, अघोर, तत्पुरुष, वामदेव और सद्योजात। समस्त जगत के स्वामी होने के कारण शिव ‘ईशान‘ तथा निन्दित कर्म करने वालों को शुद्ध करने के कारण ‘अघोर‘ कहलाते हैं। अपनी आत्मा में स्थिति-लाभ करने से वे ‘तत्पुरुष‘ और विकारों को नष्ट करने के कारण ‘वामदेव‘ तथा बालकों के सदृश्य परम स्वच्छ और निर्विकार होने के कारण ‘सद्योजात‘ कहलाते हैं।
सोम-सूर्य-अग्निरूप तीन नेत्र होने से वे ‘त्र्यम्बकेश्वर‘ कहलाए। ब्रह्मा से लेकर स्थावरपर्यन्त सभी जीव पशु माने गए हैं, अत: उनको अज्ञान से बचाने के कारण वे ‘पशुपति‘ कहलाते हैं। शिवजी के उपासकों में उनका ‘महाभिषक्‘ नाम अत्यन्त प्रिय है। देवों के देव होने के कारण उनकी ‘महादेव‘ नाम से निरन्तर उपासना होती रही है।
‘सहस्त्राक्ष‘ नाम उनकी प्रभुता का द्योतक है। सभी विद्याओं एवं भूतों के ईश्वर हैं, अत: ‘महेश्वर‘ कहलाते हैं। प्रणवस्वरूप चन्द्रशेखर शिव को ‘पुष्टिवर्धन‘ भी कहा जाता है। यह नाम पुष्टि, पोषण और उनकी अनुग्रह शक्ति का द्योतक है। भगवान शिव ने हरिचरणामृतरूपा गंगा को जटाजूट में बांध लिया, अत: वे ‘गंगाधर‘ कहलाए।
कालकूट विष को अपनी योगशक्ति से आकृष्ट कर कण्ठ में धारण करके ‘नीलकण्ठ‘ कहलाए। उसी समय उस विष की शान्ति के लिए देवताओं के अनुरोध पर चन्द्रमा को अपने ललाट पर धारण कर लिया और ‘चन्द्रशेखर, शशिशेखर‘ कहलाए। भगवान शिव के मस्तक पर चन्द्रकला और गंगा-ये दोनों फायर-ब्रिगेड हैं जोकि उनके तीसरे नेत्र अग्नि और कण्ठ में कालकूट विष- इन दोनों को शान्त करने के लिए शीतल-तत्त्व हैं।
कण्ठ में कालकूट विष और गले में शेषनाग को धारण करने से उनकी ‘मृत्युज्जयता‘ स्पष्ट होती है। तामस से तामस असुर, दैत्य, यक्ष, भूत, प्रेत, पिशाच, बेताल, डाकिनी, शाकिनी, सर्प, सिंह-सभी जिसे पूजें, वही शिव ‘परमेश्वर‘ हैं। वे ‘नीलग्रीवी‘, ‘नीलशिखण्डी‘, ‘कृतिवासा‘, ‘गिरित्र‘, ‘गिरिचर‘, ‘गिरिशय‘, ‘क्षेत्रपति‘ और ‘वणिक्‘ आदि अनेक नामों से पूजे जाते हैं।
शिव को उनके गुणों के कारण ‘मृत्युंजय‘, ‘त्रिनेत्र, ‘पंचवक्त्र‘, ‘खण्डपरशु‘, ‘आदिनाथ‘, ‘पिनाकधारी‘, ‘उमापति‘, ‘शम्भु‘ और ‘भूतेश‘ भी कहा गया है। वे ‘प्रमथाधिप‘, ‘शूली‘, ‘ईश्वर‘, ‘शंकर‘, ‘मृड‘, ‘श्रीकण्ठ‘, ‘शितिकण्ठ‘, ‘विरुपाक्ष‘, ‘धूर्जटि‘, ‘नीललोहित‘, ‘स्मरहर‘, ‘व्योमकेश‘, ‘स्थाणु‘, ‘त्रिपुरान्तक‘, ‘भावुक‘, ‘भाविक‘, ‘भव्य‘, ‘कुशलक्षेम‘ आदि नामों से भी अभिहित किए जाते हैं। पुराणों में भगवान शिव को विद्या का प्रधान देवता कहा गया है इसलिए उन्हें ‘विद्यातीर्थ‘ और ‘सर्वज्ञ‘ भी कहा जाता है।
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शिवपुराण में शिव के निराकार एवं विराट् रूप का वर्णन मिलता है। शिव का एक नाम ‘अष्टमूर्ति‘ है। इन अष्टमूर्तियों के नाम इस प्रकार हैं- शर्व, भव, रुद्र, उग्र, भीम, पशुपति, महादेव एवं ईशान। ये अष्टमूर्तियां क्रमश: पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, क्षेत्रज्ञ, सूर्य व चन्द्रमा को अधिष्ठित करती हैं। इनसे समस्त चराचर का बोध होता है।
भक्ति-भावना से प्रेरित होकर शिवभक्तों ने शिव के अनेक नाम दिए है। किसी भक्त ने शिव को ‘अर्धनारीश्वर‘ माना है, तो किसी ने उन्हें ‘मदनजित्‘ कहा। किसी ने शिव को ‘भस्मधारी‘कहा।
मनुष्य संसार में बहुत दु:ख भोगता है जिनसे छुटकारा केवल प्रलय में ही मिलता है। शिव प्रलय के समय माता-पिता के समान सबको सुला देते हैं, सबके दु:खों को हर लेते हैं, अत: वे ‘हर‘ कहलाते हैं और सभी को प्रलय के समय अपने स्वरूप में लीन कर परम शान्ति प्रदान करते हैं इसलिए ‘सदाशिव‘ हैं।
सभी सत्वगुण उन्हीं से प्रकट हैं, अत: वह सत्त्वगुण के समान स्वच्छ ‘कर्पूर–गौर‘ हैं। वह पापियों को आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक शूल (पीड़ा) देते हैं, इसलिए ‘त्रिशूलधारी‘ हैं। प्रलयकाल में उनके अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं रहता, ब्रह्माण्ड श्मशान हो जाता है, उसकी भस्म और रुण्ड-मुण्ड में वही व्यापते हैं अत: ‘चिता–भस्मालेपी‘ और ‘रुण्ड–मुण्डधारी‘ हैं। वह भूत, भविष्य और वर्तमान-तीनों को जानते हैं, इसी से ‘त्रिनयन‘ कहलाते हैं। वृष का अर्थ है धर्म; शिवजी वृषभ पर चढ़ने वाले जाने जाते हैं अर्थात् धर्मात्माओं के हृदय में निवास करते हैं, वह धर्मारूढ़ हैं, इसी से ‘वृषवाहन‘ हैं।
शिव के भयंकर व सौम्य दोनों ही रूप हैं। पुराणों में शिव के भयंकर रूप के अंतर्गत ‘कपाली‘ रूप का वर्णन है। उनके इस रूप की आकृति भयावह है। उनकी जिह्वा और दृंष्ट्रा बाहर निकली हुई हैं। वे भीषण हैं। वस्त्रहीन होने से ‘दिगम्बर‘ कहा जाता है। शरीर पर भस्म का अवलेपन हुआ है अत: ‘भस्मनाथ‘ कहे जाते हैं। उनके हाथ में कपाल का कमण्डलु, गले में नरमुण्डमाला है व श्मशान उनकी प्रिय विहारभूमि है।
शिव का एक नाम ‘रुद्र‘ है क्योंकि वह दीन-दुखियों के दु:ख पर आँसू बहाते हैं तथा पापियों को रुलाते हैं। संहारकर्ता के रूप में उनका उग्र व ‘रुद्र’ रूप सामने आता है। इस रूप में उन्हें ‘चण्ड‘, ‘भैरव‘, ‘विरुपाक्ष‘, ‘महाकाल‘ आदि उपाधियां प्रदान की गईं। मत्स्यपुराण में शिव के इस रूप को साक्षात् ‘मृत्यु‘ कहा गया है। इस रूप में उनके अनुचर दानव, दैत्य, यक्ष और गंधर्व रहते हैं। जैसे प्राणी कढ़ी-भात मिलाकर खा लेता है, वैसे ही विश्वसंहारक काल और समस्त प्रपंच को मिलाकर खाने वाले शिव मृत्यु का भी मृत्यु है, अत: ‘मृत्युज्जय‘ भी वही है। शिव काल के भी काल है अत: ‘महाकाल‘ या ‘महाकालेश्वर‘ है।
पुराणों में शिव के उग्र रूप के साथ सौम्यरूप का भी उल्लेख किया गया है। इस रूप में वे सतत् मानवजाति के कल्याणकारी देवता हैं। वे ‘नटराज‘ हैं, पार्वती के पति ‘उमामहेश्वर‘ हैं, ‘अर्धनारीश्वर‘ हैं, ‘हरिहर‘ हैं, ‘वृषवाहन‘ हैं, ‘लिंगमूर्ति‘ हैं।
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यजुर्वेद (१६।४१) में भगवान शंकर की विभिन्न नामों से स्तुति की गयी है-
‘नम: शम्भवाय च मयोभवाय च नम: शंकराय च मयस्कराय च नम: शिवाय च शिवतराय च।‘
अर्थात-कल्याण एवं सुख के मूल स्त्रोत भगवान शिव को नमस्कार है। कल्याण के विस्तार करने वाले तथा सुख के विस्तार करने वाले भगवान शिव को नमस्कार है। मंगलस्वरूप और मंगलमयता की सीमा भगवान शिव को नमस्कार है।
गोस्वामी तुलसीदास ने अपने आराध्यदेव श्रीराम की भक्ति प्राप्त करने के लिए शिव की स्तुति की है। उन्होंने शिवजी के अनेक नामों का गुणगान किया है-
अहिभूषन दूषन–रिपु–सेवक देव–देव त्रिपुरारी।
मोह–निहार–दिवाकर संकर सरन–सोक–भयहारी।। (विनयपत्रिका पद ९)
संगीतज्ञ तानसेन भी शिव के नाम को एकमात्र आधार मानकर कहते हैं-
महादेव आदिदेव देवादेव महेश्वर ईश्वर हर।
नीलकंठ गिरजापति कैलासपति शिवशंकर भोलानाथ गंगाधर।।
तानसेन शिव से नाद-विद्या मांगते हुए उनके रूप का इस प्रकार का चित्रण करते हैं-
रूप बहुरूप भयानक बाघंकर।
अंबर खापर त्रिशूल कर।।
तानसेन को प्रभु दीने नाद विद्या।
संगत सौं गाऊँ बजाऊँ बीन कर धर।।
!! Har Har Mahadev….. Jai Mahesh…. Jai Hariyali Teej Mata ki….Happy Shravan Somvar !!
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(Photo Courtesy: Dungariya Mahadev, Jodhpur)




