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Baba Ramdev Jayanti ‘बाबा री बीज’ 2018 : रामदेव जी की कथा, पीर बनने का रहस्य


खम्मा खम्मा रुणिचे रा धनिया .. ( Khamma Khamma Runeche Ra Dhaniya.. ), devoted for the Baba Ramdev Ji, is one of famous and popular Bhajan not only in Rajasthan but in other places too. Baba Ramdev Jayanti, the birth tithi of Ramdev Ji, is celebrated every year in India by his devotees. It falls on Shukla Paksha Dooj (the second day) of Bhadrapad month of Hindu calendar and is also famous as ‘बाबा री बीज‘ (‘बाबा री दूज‘). This Year, Baba Ramdev Jayanti 2018 will be celebrated on September 11.

पीरों के पीर रामापीर, बाबाओं के बाबा रामदेव बाबाको सभी भक्तबाबा री’ से जयकार करते हैं। बाबा रामदेव (Baba Ramdev) is a Hindu folk deity of Rajasthan, India. He was a fourteenth-century ruler of the place – Pokhran,  जहां भारत ने परमाणु परीक्षण किया था | He was a very hardworking king who dedicated his life to the people of his kingdom. He said to have miraculous Spiritual powers, an incarnation of Lord Krishna, who devoted his life to the upliftment of the downtrodden and poor people of society. He is worshipped today by many social groups and religions of India as their Ishta-deva. Hindus, Muslims, Jains and Sikhs are his followers.


Baba Ramdev (बाबा रामदेव) is also called as RamdevjiRamdeo PirRamsa Pir, Ramdev Pir ( रामदेव पीर), and many such names. हिन्दू उन्हें रामदेवजी और मुस्लिम उन्हें रामसा पीर कहते हैं। रामदेव को द्वारिका‍धीश (श्रीकृष्ण) का अवतार माना जाता है। He took Samadhi at the age of 33 on Bhadrapada Shukla Ekadashi. हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रतीक बाबा रामदेव के समाधि स्थल रुणिचा में मेला लगता है, जहां भारत और पाकिस्तान से लाखों की तादाद में लोग आते हैं। Though he was a reviver of Hinduism, he treated people of all religions equally.

He was considered as God by the people of Rajasthan. Temples were built for him. The biggest temple of Ramdevji is situated at Ramdevra which is 10 km away from Pokhran. His Samadhi is located here. This is considered to be one of the holiest places. His followers hail mainly from Rajasthan, Haryana, Punjab, Gujarat, Madhya Pradesh and Sindh.

कुछ विद्वान मानते हैं कि विक्रम संवत 1409 (1352 ईस्वी सन्) को उडूकासमीर (बाड़मेर) में बाबा का जन्म हुआ था और विक्रम संवत 1442 में उन्होंने रुणिचा में जीवित समाधि ले ली। पिता का नाम अजमालजी तंवर, माता का नाम मैणादे, पत्नी का नाम नेतलदे, गुरु का नाम बालीनाथ, घोड़े का नाम लाली रा असवार था।

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Birth Story of Baba Ramdev / बाबा रामदेव की जन्मकथा

He was the son of King Ajamal and Queen Mainaldevi. एक बार अनंगपाल, तीर्थयात्रा को निकलते समय पृथ्वीराज चौहान को राजकाज सौंप गए। तीर्थयात्रा से लौटने के बाद पृथ्वीराज चौहान ने उन्हें राज्य पुनः सौंपने से इंकार कर दिया। अनंगपाल और उनके समर्थक दुखी हो जैसलमेर की शिव तहसील में बस गए। इन्हीं अनंगपाल के वंशजों में अजमल और मेणादे थे।

For many years the couple remained childless. नि:संतान अजमल दंपत्ति श्रीकृष्ण के अनन्य उपासक थे। एक बार कुछ किसान खेत में बीज बोने जा रहे थे कि उन्हें अजमलजी रास्ते में मिल गए। किसानों ने नि:संतान अजमल को शकुन खराब होने की बात कहकर ताना दिया। दुखी अजमलजी ने भगवान श्रीकृष्ण के दरबार में अपनी व्यथा प्रस्तुत की। He prayed to Lord Krishna for children and expressed his wish to have a son like Krishna. भगवान श्रीकृष्ण ने इस पर उन्हें आश्वस्त किया कि वे स्वयं उनके घर अवतार लेंगे। बाबा रामदेव के रूप में जन्मे श्रीकृष्ण पालने में खेलते अवतरित हुए और अपने चमत्कारों से लोगों की आस्था का केंद्र बनते गए।

बाबा रामदेव जी की परचा (चमत्कार )

बाबा रामदेव के पिता और राजा अजमलजी को द्वारकाद्धीश श्रीकृष्ण ने ये वरदान दिया था कि वो स्वंय उनके घर अवतरित होंगे। इसी तरह बाबा रामदेव के रूप में वो पैदा हुए। उन्होंने बचपन में ही अपनी लीलाएं दिखानी शुरू कर दीं। माता के आंचल से दूध खुद ही बाबा जी के मुहं में चला जाता था। पांच साल की उम्र में उन्होंने लकड़ी का और कपड़े का घोड़ा आकाश में उड़ाया और आदू राक्षस को मार गिराया। बाद में भैरव राक्षस का भी वध किया। बोहिता राजसेठ की नाव को समुद्र के तूफान से निकालकर किनारे लगाया। स्वारकीया सखा को सांप से डस लिया और मर गया। तब रामदेव जी ने उसका नाम पुकारा और वो जिंदा हो गया। पीर रामदेव ने अंधों को आंखें दी, कोढिय़ों का कोढ़ ठीक किया, लंगड़ों को चलाया। बाद में उन्होंने पोखरण राज्य अपनी बहन को दहेज में दे दिया और रूणिचा के राजा बने। यहीं पर उन्होंने जीवित समाधि ली।

Celebrations of Baba Ramdev Jayanti

Baba Ramdev Jayanti or Ramdev Pir Jayanti is celebrated by his followers with lot of dedication and devotion. This day is observed as a public holiday in the state of Rajasthan. His temples are very well decorated on this day. His devotees visit temples early in the morning to worship him. Special meals are made at home and offered to him. घर पर धूप, दीप जलाकर बाबा रामदेव जी को नारियल और मिठाई का भोग लगाया जाता हैं.

Devotees give toy wooden horses with new clothes on this day in the temple. A mega-fest is organized near his Samadhi Sthal, Runecha and in Jodhpur (बाबा बालिनाथ जी की समाधी). It is considered to be the biggest and the most famous one. Not only Hindus, but people from other communities also visit his Samadhi in large numbers and pray for a peaceful and prosperous life. Special prayers are held at Ramdevra temple on this occasion. Bhajans and Satsangs are organized on this day.

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Why does Horse offer to Baba Ramdev?

There are a few interesting stories related to his spiritual powers. When he was a child, his father ordered a toy wooden horse for him. The toy maker took the costly cloth from the king and used an older one on the horse. When Baba sat on the toy, it flew into the air and the horse disappeared. He returned to land after some time. The horse could get life because of Baba. The toy maker was shocked at this incident and apologized for cheating the king. Due to this reason devotees offer a wooden toy with a new cloth in the temples on Baba Ramdev Jayanthi.

रामापीर बनने का रहस्य

Once five saints from Mecca came to test his spiritual powers. रामदेवजी ने उनकी आवभगत की और ‘‍अतिथि देवो भव:‘ की भावना से उन्हें भोजन के लिए आमंत्रित किया। बाबा के घर जब पांचों पीरों के भोजन हेतु जाजम बिछाई गई, तकिए लगाए गए, पंखे लगाए गए और सेवा-सत्कार के सभी सामान सजाए गए, तब भोजन पर बैठते ही एक पीर बोला कि अरे, हम तो अपने खाने के कटोरे मक्का ही भूल आए हैं। हम तो अपने कटोरों में ही खाना खाते हैं, दूसरे के कटोरों में नहीं, यह हमारा प्रण है। अब हम क्या कर सकते हैं? आप यदि मक्का से वे कटोरे मंगवा सकते हैं तो मंगवा दीजिए, वर्ना हम आपके यहां भोजन नहीं कर सकते।

तब बाबा रामदेव ने उन्हें विनयपूर्वक कहा कि उनका भी प्रण है कि घर आए अतिथि को बिना भोजन कराए नहीं जाने देते। यदि आप अपने कटोरों में ही खाना चाहते हैं तो ऐसा ही होगा। इसके साथ ही बाबा ने अलौकिक चमत्कार दिखाया और जिस पीर का जो कटोरा था उसके सम्मुख रखा गया। इस चमत्कार (परचा) से वे पीर सकते में रह गए। जब पीरों ने पांचों कटोरे मक्का वाले देखे तो उन्हें अचंभा हुआ और मन में सोचने लगे कि मक्का कितना दूर है। ये कटोरे तो हम मक्का में छोड़कर आए थे। ये कटोरे यहां कैसे आए? तब उन पीरों ने कहा कि आप तो पीरों के पीर हैं।

पांचों पीरों ने कहा ‍कि आज से आपको दुनिया रामापीर के नाम से पूजेगी। इस तरह से पीरों ने भोजन किया और श्रीरामदेवजी को ‘पीर’ की पदवी मिली और रामदेवजी, रामापीर कहलाए

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श्री रामदेव जी की आरती

पिछम धरां सूं म्हारा पीर जी पधारिया ।

घर अजमल अवतार लियो ।
लाछां सुगणा करे थारी आरती ।

हरजी भाटी चंवर ढोले ।
गंगा जमुना बहे सरस्वती ।
रामदेव बाबो स्नान करे ।
लाछां सुगणा करे…

घिरत मिठाई बाबा चढे थारे चूरमो ।
धूपारी महकार पङे ।
लाछां सुगणा करे…

ढोल नगाङा बाबा नोबत बाजे ।
झालर री झणकार पङे ।
लाछां सुगणा करे…

दूर-दूर सूं आवे थारे जातरो ।
दरगा आगे बाबा नीवण करे ।
लाछां सुगणा करे…

हरी सरणे भाटी हरजी बोले ।
नवों रे खण्डों मे निसान घुरे ।
लाछां सुगणा करे…

जै बाबा रामदेव्… पीरों के पीर रामापीर, हरे सब की पीर..!!

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