Sawan Somvar: भगवान शिव और उनका अनोखा घर-संसार, शिवालय का तत्त्व-रहस्य| During Shravan month, the Shravan Nakshatra is the ruling Star. Shravan Mahina is dedicated to Lord Shiva & worshipping him during this month bring auspicious results and blessings. Aug 20 is last Shravan Somvar Vrat for the Y'2018
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Sawan Somvar: भगवान शिव और उनका अनोखा घर-संसार, शिवालय का तत्त्व-रहस्य

The last Sawan Somvar Vrat for the year 2018 will be observed on 20th August. During Shravan month, the Shravan Nakshatra is the ruling Star, thus this month has been named as Shravan or commonly called as Shravan (Sawan) Mahina. As such, this entire month is dedicated to Lord Shiva and worshipping him during this month is said to bring most auspicious results and blessings of Lord Shiva.

Many people observe fast for this entire month and make offerings to Lord Shiva everyday. During this period. a large number of people performed various Pujas for Lord Shiva, which gives very auspicious results as per our ancient texts and scripts.


This entire period of Shravan Maas will be very auspicious for Lord Shiva Devotees and almost everyone of them will observe fast either for the entire month or atleast on every Monday which falls during this period.

 

The Importance Of Sawan Somvar

Monday is represented by Moon, which in turn symbolises Mind. Moon is placed on Lord Shiva’s head. Lord Shiva is believed to discipline the mind of the spiritual aspirant and the devotees. That is why Lord Shiva is especially worshipped on Monday. If you worship Shivaling on Sawan Somvaar, you can win his special grace. Men, women and especially unmarried girls fast on this day to please Lord Shiva.

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शिवालय का तत्त्व-रहस्य

प्राय: सभी शिवालय (शिव-मन्दिरों) में प्रवेश करते ही सबसे पहले नन्दी के दर्शन होते हैं। उसके बाद कच्छप (कछुआ), गणेशजी, हनुमानजी, जलधारा, नाग आदि सभी शिव-मन्दिरों में विराजित रहते हैं। भगवान के इन प्रतीकों में बड़ा ही सूक्ष्मभाव व गूढ़ ज्ञान छिपा है।

नन्दी:-
यह सामान्य बैल नहीं है, यह ब्रह्मचर्य का प्रतीक है, भगवान धर्म ही नन्दी वृषभ के रूप में उनके वाहन बन गए हैं। जैसे नन्दी शिव का वाहन है वैसे ही हमारी आत्मा का वाहन शरीर (काया) है। अत: शिव को आत्मा का एवं नन्दी को शरीर का प्रतीक माना जा सकता है।
जैसे नन्दी की दृष्टि सदा शिव की ओर ही होती है, वैसे ही हमारा शरीर आत्माभिमुख बने अर्थात् शिवभाव से ओतप्रोत बने, इसके लिए तप एवं ब्रह्मचर्य की साधना जरूरी है, नन्दी के माध्यम से यही शिक्षा दी गई है।

कछुआ:-
कछुआ मन को दर्शाता है अर्थात् हमारा मन कछुए जैसा कवचधारी सुदृढ़ बनना चाहिए। जैसे कछुआ सदैव शिव की ओर ही गतिशील है, नन्दी की तरफ नहीं। वैसे ही हमारा मन भी आत्माभिमुख, शिवमय बनें, भौतिक या देहाभिमुख नहीं।

गणेश जी:-
जब मनुष्य के कर्म व मानसिक चिन्तन दोनों आत्मा की ओर बढ़ रहे हैं तब उनमें शिवरूपी आत्मा को प्राप्त करने की योग्यता आई है या नहीं, इसकी परख के लिए द्वार पर दो द्वारपाल खड़े हैं, गणेशजी और हनुमानजी

गणेशजी बताते हैं बुद्धि एवं समृद्धि का सदुपयोग करना, गणेशजी के हाथों में अंकुश आत्मनियन्त्रण व संयम का प्रतीक है। कमल निर्लेपता व पवित्रता का, पुस्तक उच्च विचारधारा की व मोदक मधुर स्वभाव का प्रतीक है। ऐसे गुण रखने पर ही मनुष्य शिव के दर्शन का पात्र होता है।

हनुमान जी:-
हनुमानजी विश्वहित के लिए सदैव सेवापरायणसंयमी रहे हैं, यही कारण है कि वे अर्जुन के रथ पर विराजित रहे व श्रीराम के प्रिय सेवक हैं। ऐसे गुणों से ही व्यक्ति शिवत्व का पात्र बनता है। गणेश जी और हनुमान जी की परीक्षाओं में उत्तीर्ण होने पर ही साधक को शिवरूप आत्मा की प्राप्ति हो सकती है।

किन्तु इतनी कठिन परीक्षा में विजय मिलने पर साधक को अहंकार आ जाता है, इसीलिए शिव-मन्दिर में प्रवेश-द्वार की सीढ़ी भूमि से कुछ ऊंची व प्रवेशद्वार भी कुछ छोटा होता है। ताकि साधक अत्यन्त विनम्रता व सावधानी से सिर झुकाकर अन्तिम प्रवेश द्वार में कदम रखे।
अर्थात् अहंकार का तिमिर नष्ट होने पर ही उसे शिवलिंग के दर्शन होते हैं।

शिव-मन्दिर में जो शिवलिंग है, उसे आत्मलिंग या ब्रह्मलिंग कहते हैं जो विश्व के कल्याण में निमग्न आत्मा है।

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भगवान शिव का अनोखा घरसंसार

माथे में त्रिपुण्ड बिधु बालहू बिराजै ‘प्रेम’,
जटन के बीच गंगधार को झमेला है।
सींगी कर राजै एक कर में त्रिसूल धारे,
गरे मुंडमाल घाले काँधे नाग-सेला है।।
कटि बाघछाला बाँधे भसम रमाये तन,
बाम अंग गौरी देवी चढ़न को बैला है।
धेला है न पल्ले, खरचीला है अजूबी भाँति,
ऐसा गिरिमेला देव संभु अलबेला है।।

तन पर वस्त्र नहीं, दिशाएं ही जिनका वस्त्र है, कमर पर बाघम्बर या हाथी की खाल और सांप लपेट लेते हैं, नहीं तो बर्फीले पहाड़ों पर दिगम्बर ही घूमते हैं, चिता की भस्म ही जिनका अंगराग है, गले में मुण्डों की माला, केशराशि को जटाजूट बनाए, कण्ठ में विषपान किए हुए, अंगों में सांप लपेटे हुए, क्रीड़ास्थल श्मशान, प्रेत-पिशाचगण जिनके साथी हैं, एकान्त में उन्मत्त जैसे नृत्य करते हुए-ऐसा रुद्र स्वरूप, पर नाम देखो तो ‘शिव‘। संसार में वे अपने भक्तों के लिए सर्वाधिक मंगलमय हैं। यह विरोधाभास भी बड़ा रहस्यपूर्ण हैं। ‘शिव’ जब अपने स्वरूप में लीन रहते हैं तब वह सौम्य रहते हैं, जब संसार के अनर्थों पर दृष्टि डालते हैं तो भयंकर हो जाते हैं।

भगवान शिव की गृहस्थी जितनी अद्भुत है शायद ही किसी की हो। स्वयं हैं पंचानन (पंचमुख) और अपने एक पुत्र को बना दिया षडानन (छ: मुखवाला), दूसरे पुत्र के सिर पर हाथी का सिर जोड़ दिया। स्वयं हैं भस्मांगधारी, श्मशानविहारी, तो आपकी अर्धांगिनी है साक्षात् अन्नपूर्णा और समस्त ऐश्वर्यों की स्वामिनी पार्वती

चम्पापुष्पों-सी गोरी पार्वतीजी के शरीर में कस्तूरी व कुंकुम का लेप लगा है, वहीं कर्पूर से गोरे शंकरजी के शरीर पर चिताभस्म का लेपन है। पार्वतीजी कामदेव को जिलानेवाली हैं तो शंकरजी उसे नष्ट करने वाले हैं। पार्वतीजी के केशपाश मन्दार-पुष्पों की माला से शोभित हैं, जबकि भगवान शंकर के गले में मुण्डों की माला है। पार्वतीजी के अति दिव्य वस्त्र हैं, जबकि शंकरजी दिगम्बर हैं। सवारी के लिए रखा सीधा-सादा बैल और वह भी एकदम बूढ़ा। श्रृंगार के लिए रखे सर्प और मुण्डों की माला। पार्वतीजी लास्य नृत्य करती हैं तो जगत की रचना होती है, और शंकरजी के ताण्डव नृत्य से सृष्टि का संहार होता है।

भगवान शिव का परिवार बहुत बड़ा है। एकादश रूद्र, रुद्राणियां, चौंसठ योगिनियां, मातृकाएं तथा भैरवादि इनके सहचर तथा सहचरी हैं। उनके गण कितने निराले हैं-भूत, प्रेत, बेताल, डाकिनी-शाकिनी, पिशाच, ब्रह्मराक्षस, क्षेत्रपाल, भैरव आदि|

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इस परिवार के सदस्य ही अलबेले नहीं हैं बल्कि इनका तबेला जहां इनके वाहन रहते हैं वहां भी एक अद्भुत खटपट चलती रहती है। पिताजी के इस तबेले का हाल बुरा है- भोलेबाबा की सवारी है बैल और पार्वतीजी की सवारी है सिंह। अब भला बैल और सिंह कभी एक ही नाथ से नथे जा सकते हैं। गणेशजी को दिया चूहा और खुद रख लिया सांप और कार्तिकेयजी को दे दिया मोर। अब ये तीनों एक-के-ऊपर-एक सवारी करने को तैयार। क्या दृश्य होगा! फिर मजा ये कि जरा-सी खलबलाहट से भयंकर रूप से भौंकने वाला कुत्ता दे दिया अपने कोतवाल भैरवजी को और यह कुत्ता भी उसी तबेले में डाल दिया गया है, जहां बैल, सिंह, चूहा, मोर व सांप हैं।

अब भला बताइए त्रिपुरारि की हालत क्या होगी? इस धमा-चौकड़ी से किसकी तबियत न खीझ उठेगी? जो देखो दूसरे पर गुर्रा रहा है। एक-दूसरे को फाड़ खाने को तैयार है। भगवान शिव का तबेला माने विरोधाभासों का जमघट। कहीं बैल तो कहीं बाघ। कहीं चूहा तो कहीं सांप।परन्तु कुशल राजनीतिज्ञ भगवान शिव ने सब अच्छे से सम्हाला है|

इन सारे विरोधाभासों के बीच हंसते-हंसते कालकूट विष को गटक जाने वाले नीलकण्ठ, सदाशिव, शंकर। भगवान शंकर तो प्रेम और शान्ति के अथाह समुद्र और सच्चे योगी ठहरे। उनके मंगलमय शासन में सभी प्राणी अपना वैर-भाव भुलाकर पूर्ण शान्तिमय जीवन व्यतीत करते हैं। वे इतने अहिंसक हैं कि सर्प, बिच्छू भी उनके आभूषण बने हुए हैं। उनके चारों ओर आनन्द के ही परमाणु फैले रहते हैं इसीलिए ‘शिव‘ (कल्याणरूप) एवं ‘शंकर‘ (आनन्ददाता) कहलाते हैं।

नमो नम: शंकरपार्वतीभ्याम्

!! Har Har Mahadev….. Jai Mahesh…. Happy Sawan Somvar !!

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(Photo Courtesy: Justdial )


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