Bach Baras 2020: बछ बारस का पर्व जन्माष्टमी के चार दिन पश्चात भाद्रपद महीने के कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि के दिन मनाया जाता है। इस दिन गाय और उसके बछड़े की पूजा की जाती है। बछ बारस को गौवत्स द्वादशी, वत्स द्वादशी और बच्छ दुआ भी कहते हैं। यह पर्व को मनाने का उद्देश्य गाय व बछड़े (गाय के छोटे बच्चे) का महत्त्व समझाना है। बछबारस का पर्व राजस्थान में ज्यादा लोकप्रिय है।
Bach Baras 2020, 16 अगस्त रविवार को मनाया जाएगा। बछ बारस के दिन पुत्रवती स्त्रियां अपने पुत्रों के सुख और दीर्घायु होने की कामना करती हैं। इस दिन महिलायें बछ बारस का व्रत रखती है। यह व्रत सुहागन महिलाएं सुपुत्र प्राप्ति और पुत्र की मंगल कामना के लिए व परिवार की खुशहाली के लिए करती है। इस दिन गाय का दूध और उस दूध से बने पदार्थ जैसे दही, मक्खन, घी आदि का उपयोग नहीं किया जाता। इसके अलावा गेहूँ तथा इनसे बने व्यंजन नहीं खाये जाते।
गाय में सैकड़ो देवताओं का वास माना जाता है तथा भगवान कृष्ण को गाय व बछड़ा बहुत प्रिय है। ऐसा माना जाता है की गाय व बछड़े की पूजा करने से कृष्ण भगवान का, गाय में निवास करने वाले सैकड़ो देवताओं का और गौ माता का आशीर्वाद मिलता है जिससे परिवार में खुशहाली और सम्पन्नता बनी रहती है।
जानिए Bach Baras 2020 Date, पूजा विधि, शुभ मुहुर्त, बछ बारस महत्व, बछ बारस के नियम, बछ बारस पूजन की सामग्री, बछ बारस (गोवत्स द्वादशी) की कहानी समेत सभी जानकारी।
Bach Baras 2020 Date
15 तारीख शनिवार दोपहर 2:20 तक भाद्रपद महीने ग्यारस (एकादशी) तिथि है इसके बाद द्वादशी तिथि प्रारंभ हो जाएगी। 16 तारीख रविवार को द्वादशी है ।
ये पढ़ें: भादों महीने में ये आएंगे विशेष पुण्यदायी व्रत-त्यौहार
बछ बारस पर्व के नियम
यह पर्व महिलाएं सुपुत्र प्राप्ति और उसकी मंगल कामना (सुरक्षा) के लिए करती है। गाय और बछड़े का पूजन किया जाता है। भारतीय धार्मिक शास्त्रों के अनुसार बछ बारस बछ बारस पर्व के कुछ नियम इस प्रकार हैं –
- इस दिन गाय का दूध और उससे बने पदार्थ जैसे दही, मक्खन, घी आदि का उपयोग नहीं किया जाता, केवल भैंस या बकरी का दूध ही उपयोग में लिया जाता है।
- गेहूँ तथा इनसे बने खाद्य पदार्थ नहीं खाये जाते। भोजन में बेसन से बने आहार जैसे कढ़ी, पकोड़ी, भजिये आदि तथा मक्के, बाजरे, ज्वार आदि की रोटी तथा बेसन से बनी मिठाई का उपयोग किया जाता है।
- भोजन में चाकू से कटी हुई किसी भी चीज का सेवन नहीं करते है। इस दिन अंकुरित अनाज जैसे चना, मोठ, मूंग, मटर आदि का उपयोग किया जाता है।
- इस दिन घरों में विशेष कर बाजरे की रोटी जिसे सोगरा कहा जाता है और अंकुरित अनाज की सब्जी बनाई जाती है।
- भोजन में चाकू से कटी हुई किसी भी चीज का सेवन नहीं करते है। इस दिन अंकुरित अनाज जैसे चना, मोठ, मूंग, मटर आदि का उपयोग किया जाता है। भोजन में बेसन से बने आहार जैसे कढ़ी, पकोड़ी, भजिये आदि तथा मक्के, बाजरे, ज्वार आदि की रोटी तथा बेसन से बनी मिठाई का उपयोग किया जाता है।
बछ बारस पूजन की सामग्री
पूजा के लिए भैंस का दूध और दही, भीगा हुआ चना, बाजरी और मोठ, और बाजरी के आटे की चार पिंडिया लेते हैं।
चने की दाल का लड्डू, कच्चा दूध, मेहंदी, रोली, चंदन, मोली, चावल, गुड़, सुपारी, पैसे, ओढना, ब्लाउस पीस, फूल माला लेकर गाय उसके बछड़े की पूजा करनी चाहिए।
बछ बारस की पूजा विधि
बच्चों पर ममता और स्नेह से जुड़ा लोक पर्व बछ बारस पारम्परिक हर्षोल्लास से मनाया जाता हैं। सुबह जल्दी उठकर नहा धोकर स्वच्छ कपड़े पहने और पूजा की सामग्री तैयार करे। दूध देने वाली गाय और उसके बछड़े को साफ पानी से नहलाकर शुद्ध कर उन्हे नए वस्त्र ओढ़ाएँ, फूल माला पहनाएँ, उनके सींगों को सजाएँ और उन्हें तिलक करें।
गाय और बछड़े को भीगे हुए अंकुरित चने, मूंग, मोठ, बाजरे, मटर, चने के बिरवे, जौ की रोटी आदि खिलाएँ। अब इस मंत्र का उच्चारण करते हुए गाय के पैर धोएं-
क्षीरोदार्णवसम्भूते सुरासुरनमस्कृते।
सर्वदेवमये मातर्गृहाणार्घ्य नमो नम:॥
गौ माता के पैरों की धूल से खुद के तिलक लगाएँ। कुए की पूजा करें।
कुए के प्रतिक के तौर पर घरों के बाहर गोबर से घेरा (पाळ) बनाकर उसमे पानी भर कर पूजन किया जाता है। यदि गोबर ना मिल पाए तो एक पाटे पर मिटटी से बछबारस बनाते है और उसके बीच में एक गोल मिटटी की बावडी बनाते है। फिर उसको थोडा दूध, दही, पानी से भर देते है। फिर सब चीजे चढाकर पूजा करते है। इसके बाद रोली, मोली, दक्षिणा चढाते है। स्वयम को तिलक निकालते है। घर के सभी उम्र के बच्चों को आओ रे म्हारा हंसराज…. बछराज… कहकर पूजन स्थल पर आमंत्रित करते हैं।
पूजन के समय बच्चे भी मां का पल्लू थामकर पाळ से लड्डू उठाकर और चरण स्पर्श कर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। इस प्रकार गाय और बछड़े की पूजा करने के बाद महिलायें अपने पुत्र के तिलक लगाकर उसे लड्डू खिलाने के बाद नारियल (उपहार) देकर उसकी लंबी उम्र और सकुशलता की कामना करते हुए आशीर्वाद देती हैं।
यदि गाय नहीं हो तो गीली मिट्टी से या आटे से गाय और बछड़े की आकृति बना कर उनकी पूजा कर सकते है। इसके बाद हाथ में मोठ और बाजरे के दाने को लेकर बछ बारस की कहानी व प्रचलित लोककथा सुने। बड़े बुजुर्ग के पाँव छूकर उनसे आशीर्वाद लें।
READ ALSO: Paryushan Mahaparv: The Festival Of Peace And Soul Purification
बछ बारस के व्रत का उद्यापन
बछ बारस के व्रत का उद्यापन करते समय इसी प्रकार का भोजन बनाना चाहिए। उज़मने में यानि उद्यापन में बारह स्त्रियां, दो चाँद सूरज की और एक साठिया इन सबको यही भोजन कराया जाता है।
शास्त्रो के अनुसार इस दिन गाय की सेवा करने से, उसे हरा चारा खिलाने से परिवार में महालक्ष्मी की कृपा बनी रहती है तथा परिवार में अकालमृत्यु की सम्भावना समाप्त होती है।
जिस साल लड़का हो या जिस साल लडके की शादी हो उस साल बछबारस का उद्यापन किया जाता है | सारी पूजा हर वर्ष की तरह करे | सिर्फ थाली में सवा सेर भीगे मोठ बाजरा की तरह कुद्दी करे | दो दो मुट्ठी मोई का (बाजरे की आटे में घी ,चीनी मिलाकर पानी में गूँथ ले ) और दो दो टुकड़े खीरे के तेरह कुडी पर रखे | इसके उपर एक तीयल (दो साडीया और ब्लाउज पीस ) और रुपया रखकर हाथ फेरकर सास को छुकर दे | इस तरह Bach Baras बछबारस का उद्यापन पूरा होता है |
बछ बारस महत्व
भारतीय धार्मिक पुराणों में गौमाता में समस्त तीर्थ होने की बात कहीं गई है। भविष्य पुराण के अनुसार गौमाता कि पृष्ठदेश में ब्रह्म का वास है, गले में विष्णु का, मुख में रुद्र (महादेव) का, ग्रीवा में माता पार्वती, मध्य में समस्त देवताओं और रोमकूपों में महर्षिगण, पूंछ में अनंत नाग, खूरों में समस्त पर्वत, गौमूत्र में गंगादि नदियां, गौमय में लक्ष्मी और नेत्रों में सूर्य-चन्द्र विराजित हैं। गौमाता के दर्शन मात्र से ऐसा पुण्य प्राप्त होता है, जो बड़े-बड़े यज्ञ, दान आदि कर्मों से भी नहीं प्राप्त हो सकता।
हमारे शास्त्रों में इसका माहात्म्य बताते हुए कहा गया है कि बछ बारस के दिन जिस घर की महिलाएं गौमाता का पूजन-अर्चन करती हैं, गाय की सेवा करती है, गाय को रोटी और हरा चारा खिलाकर तृप्त करती है, उस घर में मां लक्ष्मी की कृपा सदैव बनी रहती है तथा परिवार में अकालमृत्यु की सम्भावना समाप्त होती है।
बछ बारस (गोवत्स द्वादशी) की कथा
इस व्रत में सुनाई और पढ़ी जाने वाली अनेक कथायें प्रचलित हैं, पर प्रत्येक कथा जन कल्याण के लिए, बछ बारस पर्व के रीति रिवाज से जुड़ी है।
बछ बारस की कहानी – 1
कई साल पुरानी बात है, एक साहूकार था। इसके सात बेटे और कई पोते थे। एक बार गांव में भीषण अकाल पड़ा। साहूकार ने गांव में एक जोहड़ (तालाब ) बनया लेकिन, उसमें पानी नहीं आया। वह चिन्ता में रहने लगा। साहूकार ने पंडितों से उपाय पूछा।
पंडितो ने बताया की तुम्हारे बड़े बेटे या बड़े पोते में से एक की बलि दे दो तो पानी आ सकता है। साहूकार ने सोचा किसी भी प्रकार से गांव का भला होना चाहिए।
साहूकार ने बहाने से बहु को एक पोते हंसराज के साथ पीहर भेज दिया और एक पोते को अपने पास रख लिया जिसका नाम बच्छराज था। बच्छराज की बलि दे दी गई। इतने में गरजते बरसते बादल आये और तालाब पानी से पूरा भर गया।
साहूकार ने तालाब पर बड़े यज्ञ का आयोजन किया। लेकिन झिझक के कारण बहू को बुलावा नहीं भेज पाये। बहु के भाई ने कहा “तेरे यहाँ इतना बड़ा उत्सव है तुझे क्यों नहीं बुलाया? मुझे बुलाया है, मैं जा रहा हूँ”। बहू बोली “बहुत से काम होते है इसलिए भूल गए होंगें, अपने घर जाने में कैसी शर्म ” मैं भी चलती हूँ।
घर पहुंची तो सास ससुर डरने लगे कि बहु को क्या जवाब देंगे। फिर भी सास बोली बहू चलो बछ बारस की पूजा करने तालाब पर चलें। दोनों ने जाकर पूजा की। साहूकार साहुकरनी मन ही मन बछबारस माता से प्रार्थना करने लगे की हे माता ! हमारी लाज रखना बहूँ को उसका बेटा कहा से देंगे | सास बोली, बहु तालाब की किनार खंडित करो।
बहु बोली मेरे तो हंसराज और बच्छराज है, मैं खंडित क्यों करूँ। सास बोली “जैसा मैं कहू वैसे करो“। बहू ने सास की बात मानते हुए तालाब और गाय की पूजा कर तालाब का किनारा खंडित कर कहा “आओ मेरे हंसराज, बच्छराज लडडू उठाओ। ”
भगवान की कृपा हुई। तालाब की मिट्टी में लिपटा बच्छराज व हंसराज दोनों दौड़े आये। बहू पूछने लगी “सासूजी ये सब क्या है ?” सास ने बहू को सारी बात बताई और कहा भगवान ने मेरा सत रखा है।
इसलिए बछबारस की पूजा में महिलाये गाय के गोबर से तालाब बनाकर पूजा कर किनारा खण्डित कर उस पर लड्डू रख कर अपने बेटे से उठवाती हैं। हे बछबारस माता ! जैसे साहूकार साहुकारनी की लाज रखी वैसे सबकी रखना।
ये भी पढ़ें: ऊब छठ व्रत कथा, नियम, पूजा और उद्यापन विधि
बछ बारस की कहानी – 2
एक सास बहु थी। सास को गाय चराने के लिए वन में जाना जाना था। उसने बहु से कहा “आज बछ बारस है में वन जा रही हूँ तो तुम गेहू लाकर पका लेना और धान लाकर उछेड़ लेना। बहू काम में व्यस्त थी। उसने ध्यान से सुना नहीं। उसे लगा सास ने कहा गेहूंला धानुला को पका लेना। गेहूला और धानुला गाय के दो बछड़ों के नाम थे। बहू को कुछ गलत तो लग रहा था लेकिन उसने सास का कहा मानते हुए बछड़ों को काट कर पकने के लिए चढ़ा दिया ।
सास ने लौटने पर पर कहा आज बछ बारस है, बछड़ों को छोड़ो पहले गाय की पूजा कर लें। बहु डरने लगी, भगवान से प्रार्थना करने लगी बोली हे भगवान मेरी लाज रखना। विनती सुन बछबारस माता को उसके भोलेपन पर दया आ गई।
हांड़ी में से जीवित बछड़ा बाहर निकल आया। सास के पूछने पर बहु ने सारी घटना सुना दी। और कहा भगवान ने मेरा सत रखा, बछड़े को फिर से जीवित कर दिया। इसीलिए बछ बारस के दिन गेंहू नहीं खाये जाते और कटी हुई चीजें नहीं खाते है। गाय बछड़े की पूजा करते है।
खोटी की खरी, अधूरी की पूरी ..
हे बछ बारस माता जैसे बहु की लाज रखी वैसे सबकी रखना।
|| बछबारस माता की जय || || गौ माता की जय ||
READ MORE: Goga Navami – राजस्थान का लोक पर्व, होती है सांपों के देवता ‘गोगा जी’ की पूजा
Bach Baras 2020 की हार्दिक शुभकामनाएं !!
Connect with us through Facebook for all latest updates of Hindu Tradition, Fasts & Festivals and Culture. Do comment below for any more information or query on Bach Baras 2020 and let us know, how you celebrated.
(इस आलेख में दी गई Bach Baras 2020 की जानकारियां धार्मिक आस्थाओं, हिंदू पांचांग और लौकिक मान्यताओं पर आधारित है।)




