Sheetala Ashtami 2021: शीतला अष्टमी का पर्व चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाया जाता हैं। इस साल Sheetala Ashtami 2021, 4 अप्रैल रविवार के दिन हैं। कुछ लोग शीतला सप्तमी (3 अप्रैल) भी पूजते हैं। शीतला अष्टमी पर शीतला माता का पूजन किया जाता है और बसौड़ा का प्रसाद लगाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि शीतला सप्तमी और शीतला अष्टमी की पूजा करने के बाद शीतला माता की कथा सुनने से माता शीतला प्रसन्न होती हैं और पूजा का सम्पूर्ण फल प्राप्त होता है। शीतला माता को अत्यंत शीतल माना जाता है और बच्चों की कई बीमारियों से माँ रक्षा करती हैं।
शीतला मां की पूजा सूर्य उगने से पहले ही कर ली जाती है, इन्हें प्रसाद के रूप में ठंडा व बासी भोजन, दही, राब, सोगरा, बाजरी और घी इत्यादि चढ़ाया जाता है और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की जाती हैं। शीतला अष्टमी के दिन घर में अग्नि जलाना निषिद्ध होता है, इसलिए लोग अपने लिए भी एक दिन पहले ही खाना बना लेते हैं। इस पर्व में एक दिन पूर्व बनाया हुआ भोजन किया जाता है, अत: शीतला अष्टमी को बसौड़ा, बास्योड़ा, बसियौरा, बसोरा, बासौड़ा पर्व भी कहते हैं।
शीतला माता का वर्णन स्कंद पुराण में भी मिलता है। इसके अनुसार देवी शीतला को दुर्गा और पार्वती का अवतार माना गया है और इन्हें रोगों से उपचार की शक्ति प्राप्त है। ठंडा भोजन खाने के पीछे भी एक धार्मिक मान्यता भी है कि माता शीतला को शीतल, ठंडा व्यंजन ओर जल पसंद है। इसलिए माता को ठंडा (बासी) व्यंजन का ही भोग लगाया जाता है, इससे शीतला माता प्रसन्न होती है।
घरों में सप्तमी के दिन कई तरह के पकवान- हलवा, पूरी, केर सांगरी की सब्जी, दही बड़ा, पकौड़ी, पुए रबड़ी, राबरी, चावल, सोगरा, आदि बनाए जाते हैं। अगले दिन अष्टमी की सुबह महिलाएं इन चीजों का भोग शीतला माता को लगाकर परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। इस दिन परिवार के सभी सदस्य भी ठंडे पानी से स्नान करते है और पहले से बनाया हुवा बासी भोजन प्रसाद के रूप मे ग्रहण करते हैं।
Sheetala Ashtami 2021 Date and Muhurat
शीतला अष्टमी – 4 अप्रैल 2021, रविवार
अष्टमी तिथि प्रारम्भ – अप्रैल 04, 2021 को सुबह 04 बजकर 12 मिनट से
अष्टमी तिथि समाप्त – अप्रैल 05, 2021 को सुबह 02 बजकर 59 मिनट तक।
शीतला अष्टमी पूजा मुहूर्त – सुबह 06 बजकर 08 मिनट से लेकर शाम को 06 बजकर 41 मिनट तक
पूजा की कुल अवधि – 12 घण्टे 33 मिनट।
बास्योड़ा लोकपर्व है, यह लोकमान्यता के अनुसार ही मनाया जाता है। ढूंढाड़ में यह लोकपर्व ठंडे वार को मनाया जाता है। इस बार अष्टमी तिथि को उग्र वार (रविवार) आ रहा है, ऐसे में बास्योड़ा पंचमीयुक्त षष्ठी तिथि पर 2 अप्रेल को मनाया जाएगा। जबकि मारवाड़ में यह परम्परा नहीं है, वहां लोकमान्यता होली के बाद अष्टमी तिथि को ही बास्योड़ा मनाया जाता है।
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शीतला माता के स्वरूप के प्रतीकात्मक अर्थ
शीतला माता के स्वरूप के प्रतीकात्मक अर्थ हैं। शीतला माता यानी पर्यावरण के शुद्धिकरण की देवी, जो सृष्टि को विषाणुओं से बचाने का संदेश देती है। माता को साफ-सफाई, स्वस्थता और शीतलता का प्रतीक माना जाता है।
उनके वस्त्रों का रंग लाल होता है जो खतरे और सतर्कता का प्रतीक माना जाता है। शीतला माता की चारों भुजाओं में झाड़ू, घड़ा, सूप और कटोरा सुशोभित होते हैं जो सफाई का प्रतीक चिन्ह हैं। उनकी सवारी गधा है, जो उन्हें गंदे स्थानों की ओर ले जाती है। झाड़ू उस स्थान की सफाई करने के लिए तो सूप कंकड़-पत्थर को अलग करने के लिए है। घड़े में भरा गंगा जल उस स्थान को विषाणु मुक्त करने के लिए एक प्रतीक के रूप में उनके एक हाथ में होता है।
शीतला अष्टमी का पर्व क्यों मनाया जाता है?
होली के एक सप्ताह बाद अष्टमी तिथि को आने वाला शीतला अष्टमी का पर्व राजस्थान में ही नहीं पूरे उतरी भारत में बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।
हिंदू धर्म की सबसे अहम बात यही है कि यह वैज्ञानिक और आध्यात्मिक है। ये अष्टमी ऋतु परिवर्तन (शीत ऋतु के खत्म होने और ग्रीष्म ऋतु की शुरुआत) का संकेत देती है, जिसके कारण संक्रामक रोगों का खतरा बढ़ जाता है। गर्मी के मौसम में चेचक, बुखार और हैजा जैसे संक्रामक रोग अधिक फैलते हैं। इन्हीं संक्रामक रोगों से बचाव के लिए शीतला अष्टमी का पर्व मनाया जाता है।
शीतला माता को चेचक की देवी माना जाता है। स्कंद पुराण के अनुसार ब्रह्मा जी ने सृष्टि को स्वस्थ व रोगमुक्त रखने का जिम्मा शीतला माता को दिया था। सफाई की प्रतीक, अरोग्यता देने वाली शीतला माता शीतलता यानी ज्वर, ताप या अग्नि उत्पन्न करने वाले रोगों से मुक्त करती है।
यही वजह है कि लोग गर्मी के प्रकोप से बचने और संक्रामक रोगों से मुक्त रहने के लिए शीतला माता की पूजा करते हैं।
शीतला माता पूजा विधि
शीतला माता की पूजा के दिन घर पर चूल्हा नहीं जलता। माता के प्रसाद के लिए व परिवार जनों के भोजन के लिए, एक दिन पहले ही सब कुछ पकाया जाता है। माता को सफाई काफी पसंद है इसलिए सब कुछ साफ-सुथरा होना बेहद आवश्यक है।
शीतला माता की पूजा के एक दिन पहले हलवा, खाजा, चूरमा, मगद, नमक पारे, शक्कर पारे, बेसन चक्की, पुए, पकौड़ी, राबड़ी, बाजरे की रोटी, पूड़ी, सब्जी आदि बनाई जाती हैं। कुल्हड़ में मोठ, बाजरा भिगो दें। इनमें से कुछ भी पूजा से पहले नहीं खाना चाहिए। माता जी की पूजा के लिए ऐसी रोटी बनानी चाहिए जिनमे लाल रंग के सिकाई के निशान नहीं हों। पूजा के एक दिन पहले रात को सारा भोजन बनाने के बाद रसोईघर की साफ सफाई करें। इसके बाद चूल्हा नहीं जलाना चाहिए।
- अष्टमी के दिन प्रात: काल ठंडे जल से स्नान करके शीतला माता, औरई माता, अचपड़ा जी, पंथवारी जी की पूजा विधि-विधान से करनी चाहिए।
- स्नान और पूजा के वक्त ‘हृं श्रीं शीतलायै नमः‘ का उच्चारण करते रहें।
- एक थाली थोड़ा दही, राबड़ी, चावल (ओलिया), पुआ, पकौड़ी, नमक पारे, रोटी, शक्कर पारे, भीगा मोठ, बाजरा आदि जो भी बनाया हो रखें।
- एक अन्य थाली में रोली, चावल, मेहंदी, काजल, हल्दी, लच्छा (मोली), वस्त्र, एक माला व सिक्का रखें।
- शीतल जल व दूध का कलश भर ले।
- बिना नमक का आटा पानी से गूंथकर इस आटे से एक छोटा दीपक बना लें। इस दीपक में रुई की बत्ती घी में डुबोकर लगा लें। यह दीपक बिना जलाए ही माता जी को चढ़ाया जाता है।
- पूजा के लिए साफ सुथरे और सुंदर वस्त्र पहनने चाहिए।
- इसके बाद मन्दिर में जाकर पूजा करें। यदि शीतला माता घर पर हो तो, घर पर पूजा कर सकते हैं।
- सबसे पहले माता जी को जल से स्नान कराएं। दूध व घी का भोग लगाए।
- रोली और हल्दी से टीका करें। काजल, मेहंदी, लच्छा, वस्त्र अर्पित करें।
- पूर्व रात्रि को बनाया गया बासी भोजन (दही, राबड़ी, चावल, हलवा, पूरी, गुलगुले आदि) का भोग माता को लगाए।
- पूजन सामग्री अर्पित करें। आटे का दीपक बिना जलाए अर्पित करें।
- हाथ जोड़ कर माता से प्रार्थना करें – हे माता, मान लेना और शीली ठंडी रहना।
- आरती या गीत गा कर मां की अर्चना करें।
- अंत में वापस जल चढ़ाएं और चढ़ाने के बाद जो जल बहता है, उसमें से थोड़ा जल लोटे में डाल लें। यह जल पवित्र होता है। इसे घर के सभी सदस्य आंखों पर लगाएं। थोड़ा जल घर के हर हिस्से में छिड़कना चाहिए। इससे घर की शुद्धि होती है पॉजिटिव एनर्जी आती है।
- पंथवारी माता जी का ध्यान कर उनको भी ऐसे ही पूजे। साथ ही शीतला माता की कथा सुनें।
इस प्रकार शीतला माता की पूजा संपन्न होती है। ठंडे व्यंजन सपरिवार मिलजुल कर खाएं और शीतला माता पर्व का आनंद उठाएं।
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शीतला माता पूजन का महत्व
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार शीतला माता की पूजा करने से चिकन पॉक्स यानी माता, खसरा, फोड़े, नेत्र रोग नहीं होते है। माता इन रोगों से रक्षा करती है।
मान्यता है कि शीतला माता ये व्रत रखने से बच्चों की सेहत अच्छी बनी रहती है। इस पूजा को करने से शीतला माता प्रसन्न होती हैं और उनके आर्शीवाद से दाहज्वर, पीतज्वर, विस्फोटक, दुर्गंधयुक्त फोड़े, शीतला की फुंसियां, शीतला जनित दोष और नेत्रों के समस्त रोग दूर हो जाते हैं। शीतला माता की पूजा से स्वच्छता और पर्यावरण को सुरक्षित रखने की प्रेरणा भी मिलती है।
|| जय शीतला माता की – Sheetala Ashtami 2021 ||
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(इस आलेख में दी गई Sheetala Ashtami 2021 की जानकारियां धार्मिक आस्थाओं और लौकिक मान्यताओं पर आधारित हैं, जिसे मात्र सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है।)




